भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

कपिरी की कमी, स्मृति की कमी, नेत्र दृष्टि की कमी, मूत्र के साथ वीर्य का पतन, अण्डकोषों की वृद्धि, अण्डकोष में दर्द, दुर्बलता, निद्रा, आलस्य, उदासी, हृदय-कंप, स्वांस में कठिनाई, यक्ष्मा, पीठ तथा कमर आदि में दर्द, चंचल मन, विचार शक्ति की कमी, घुरे स्वप्न, स्वप्नोदय तथा मानसिक अशांति । यदि यहस्य जीवन में भी ब्रह्मचर्य का पालन करे तथा वंश के लिए ही यैशुन करे तो उसकी मन्त्राल स्वस्थ, बुद्धिमान, मजबूत, सुन्दर तथा आत्मसाधी होगी । प्राचीन भारत के तपस्वी तथा संरक्षक जन विवाहित होने पर लोगों के समक्ष ब्रह्मचर्य का आदर्श रखते थे । किस तरह से यहस्याश्रम में ही ब्रह्मचर्य का पालन किया जा सकता है । हमारे पूर्वज उन ऋषियों का अनुगमन कर राष्ट्र-रक्षा के लिए ही सन्तानोत्पत्ति करते थे । जो लोग श्रीमद्भागवत् पढ़ते हैं उन्हें यह ज्ञान होगा कि किस तरह कर्दस ऋषि द्वारा देवहूति ने कपिला मुनि जैसे पुत्र को पाया था । पराशर ने मत्स्यगंधा से व्यास को जन्म दिया ।

भारतीयों की औषत आयु २२ वर्ष की है जब कि योरप वासियों की ५० की है । मातृभूमि भारत के सभी शुभेच्छुओं को चाहिए कि वे इस चिन्ताजनक स्थिति का विचार कर इसका उचित उपचार करने में प्रयत्नशील हों । प्रचार कार्य के द्वारा विद्यायियों तथा ग्रहस्थियों में ब्रह्मचर्य को पुनः स्थापित करना चाहिए । भारत का भविष्य पूर्णतः ब्रह्मचर्य पर ही है । सन्वासियों तथा योगियों का कर्तव्य है कि वे लोगों को ब्रह्मचर्य की शिक्षा दें । ग्रामन, प्राणायाम तथा आत्मज्ञान का प्रचार करें । इस परिस्थिति को सुधारने की ओर वे बहुत कुशल कर सकते हैं । क्योंकि उनके पास रगोंस समय है । उनको चाहिए