ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य का महत्व
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कि वे गुहाओं तथा कुटीरों से निकल लोक संप्रभु के कार्यों में लग जायें। उन्हें मायावाद को थोड़ा कम कर देना चाहिये। अब उनके लिए 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' हो जाना चाहिए।
माता पिता, संरक्षक, शिक्षक तथा शिक्षक सवों का यह कर्तव्य है कि वे राष्ट्र निर्माण के लिये स्वयं ब्रह्मचर्य का पालन करें तथा अपने कुमार बच्चों को भी ब्रह्मचर्य का ज्ञान करावें। हमारे प्राचीन ऋषि तथा मुनियों ने ब्रह्मचर्य के महत्व पर बल दिया था। भगवान् श्री कृष्ण ही कहते हैं "योग मार्ग पर चलने वाले को शान्त चित्त अभ्यस्य तथा ब्रह्मचर्य में दृढ़ रहना चाहिए।" गीता (६-१४) पुनः वे जोर देकर कहते हैं : उन सवों को जो कि अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए। (गीता ८-११) जब तक आप काम को वशीभूत कर ब्रह्मचर्य में स्थिर नहीं होंगे तब तक आपके लिए आध्यात्मिक मार्ग में प्रवेश पाना तथा आत्म-ज्ञान-त्कार करना असंभव ही रहेगा। यदि हमारी मातृभूमि दूसरे राष्ट्रों की दृष्टि में ऊँचा स्थान पाना चाहती है तो उसके हर बच्चे, नर तथा नारी ब्रह्मचर्य का वाट पढ़ें। इसके साथ ही साथ वे पूर्ण ब्रह्मचर्य का भी पालन करें। उनको चाहिए कि वे इस व्रत के महत्व को ममम लें। शिक्षा की कोई भी प्रणाली, जिसमें कि संस्कृत माहिर्य का अध्ययन अनिवार्य नहीं है तथा जो ब्रह्मचर्य के सिद्धांतों पर आधारित नहीं हैं हिन्दुओं के लिए किसी काम की नहीं है तथा उमर्का विफलता निश्चित ही है। जो लोग शिक्षा विभाग के निर्माता हैं वे इस ग्रंथ ने पूरी तरह अनभिषेक ही हैं। यही कारण है कि आजकल शिक्षा में