ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
बहुत मे गलत प्रयोग भी हो रहे हैं।
ब्रह्मचर्य की परमावश्यकता
मनुष्य वाचा कर्मणा युद्धता का व्रत ही ब्रह्मचर्य है जिससे मनुष्य आत्मसाक्षात्कार या ब्रह्म को प्राप्त करता है। यह केवल जननेन्द्रियों का ही नियह नहीं बल्कि सभी इन्द्रियों का मन, कर्म तथा वचन से नियह है। पूर्ण ब्रह्मचर्य ही निर्वाण का द्वार है। पूर्ण ब्रह्मचर्य की कुंजी के द्वारा ही नित्य सुख का द्वार खुलता है। परम शान्ति के प्राप्त का मार्ग ब्रह्मचर्य अथवा पूर्ण युद्धता से आरम्भ होता है।
काम का गुलाम होकर मनुष्य ने अपने को पतन के गर्त में डाल दिया है। कितने खेद की बात है कि वह यंत्रवत् बन बैठा है ! उमने विवेक बुद्धि को खो दिया है। वह गुलामी में जा गिरा है। कितनी दयनीय दशा है। यदि वह अपनी दिव्यावस्था को पुनर्प्राप्त करना चाहता है तो काम-वृत्ति का पूर्णतया रुपांतरण होना चाहिए। दिव्य विचारों तथा ध्यान के द्वारा काम की वृत्ति का रुपांतरण करना चाहिए। नित्य सुख की प्राप्ति के लिए काम-वृत्ति का रुपांतरण बहुत ही शक्तिशाली, प्रभावशाली तथा उपयुक्त तरीका है।
ब्रह्मचर्य तो योग की नींव है। जिस प्रकार क्रमजोर नींव पर खड़ी की गई इमारत एक न दिन अवश्य ही गिर जायगी उसी प्रकार आपने यदि पूर्ण ब्रह्मचर्य के ऊपर ध्यान की इमारत खड़ी नहीं की है तो निश्चय ही आपका पतन होगा। आप बाह्य वषों तक ध्यान का अभ्यास कर सकते हैं परन्तु फिर भी आपको समाधि में सफलता