भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य्य की परमावश्यकता

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नहीं मिल सकती—यदि आपने अपने हृदय की कामवासना को विनष्ट नहीं किया। आपको बड़ी सावधानी के साथ हृदय के हर कोने में इस दुष्ट काम शत्रु की खोज करनी होगी। जिस प्रकार से लोमड़ी भक्षियों के पीछे छिप जाती है उसी प्रकार काम भी हृदय के कोने में छिपा रहता है। यदि आप सावधान रहें तो आप इसको पहचान सकते हैं। उग्र आत्म निरीक्षण अत्यन्त आवश्यक है। बलशाली शत्रुओं को चारों ओर से आक्रमण के द्वारा ही आप जीत सकते हैं उसी प्रकार शक्तिशाली इन्द्रियों के पर विजय पाने के लिए आपको चारों ओर से—अन्धर से, बाहर से, ऊपर से, नीचे से आक्रमण करना होगा।

आप इस ध्रम में न पड़िये कि थोड़ा सात्विक भोजन, प्राणायाम का अभ्यास तथा थोड़ा जप के द्वारा आपने काम-वृत्ति का दमन कर लिया है और अधिक कुछ करने के लिए नहीं बचा है। किसी भी समय प्रलोभन अथवा मार आपको अपना शिकार बना सकते हैं। नित्य सावधानी तथा उग्र साधना की आवश्यकता है। सीमित प्रयास के द्वारा आप पूर्ण ब्रह्मचर्य्य को नहीं पा सकते। जिस प्रकार शक्तिशाली शत्रु को मारने के लिए मशीनगन की आवश्यकता है उसी प्रकार इस शक्तिशाली कामशत्रु को परास्त करने के लिए सतत तथा उग्र साधना की आवश्यकता है। ब्रह्मचर्य्य में प्रत्यय सफलता के द्वारा भिष्या वृष्टि न लाहये। योद्धी तो ही सफलता में अभिमान से न फूलिये। यदि आपको ज्ञान की गर्द तो आप बुरी तरह से विफल होंगे। सदा अपने दांपी में अवगत रहिए। उनको विनष्ट करने के लिए सदा प्रयत्न शील रहिये। सर्वोच्च प्रयास की आवश्यकता है। नभी आप इस दिशा में आशातीत सफलता