भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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नक्षत्रचर्य साधना

को प्राप्त कर सकते हैं।

जंगली बाघ, सिंह या हाथी को पालतू बना लेना आसान है। अजगर तथा सर्प के साथ खेलना आसान है। अग्नि को निगलना तथा सागर को सोख जाना आसान है। टिपालय को उखाड़ देना आसान है। संग्राम जेष्ठ में विजयी होना आसान है। परन्तु काम-वृत्ति का दमन करना कठिन है। ईश्वर, उसके नाम तथा उसकी कृपा में विश्वास रखिये। ईश्वरीय कृपा के बिना मन से काम-वृत्ति का पूरी तरह उन्मूलन नहीं हो सकता। यदि आपको ईश्वर में श्रद्धा है तो आपको सफलता अवश्य मिलेगी। तब आप पल मात्र में ही काम को विनष्ट कर सकते हैं। ईश्वर मूंगे को बाचाल बना देता है, पंगु को पर्यंत पर चढ़ने लायक बना देता है। मात्र मानवो प्रयास ही पर्याप्त नहीं है। ईश्वरीय कृपा की आवश्यकता है। ईश्वर भी उनकी ही सहायता करता है जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं। यदि आप पूर्ण आत्मार्पण कर दें तो स्वयं आगजनी आप के लिये साधना करेंगी।

हृदित्रय बहुत ही उपद्रवी हैं। उपवास, आहार-संयम, प्राणायामः जप, कीर्तन, ध्यान, 'मैं कौन हूँ?' का विचार, प्रत्याहार, आसन, दम, वन्ध, मुद्रा, मनोान्त्रग्रह, वासनाक्षय आदि कई तरीकों से उसका नियंत्रण करना चाहिये।

पट्ट व्यक्ति कभी भी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। यदि आप ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहते हैं तो आपको चाहिए कि आप अपनी जिहा पर पूर्ण नियन्त्रण रखें। जिहा का जननेन्द्रिय में निकट मध्यस्थ है। जिहा शानेन्द्रिय है। यह जल जन्मात्रा के भौतिक ग्रंथ से उत्पन्न है। जननेन्द्रिय कमेन्द्रिय है। यह जल जन्मात्रा के राजसिक