भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य की परमावश्यकता

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अंश से पैदा होता है। उन दोनों का मूल एक ही है। यदि राजसिक अन्न के द्वारा जिह्वा उत्तेजित हुई तो साथ ही जननेन्द्रिय भी उत्तेजित हो जाती है। आहार में चुनौत तथा संयम रखना चाहिए। ब्रह्मचारी का भोजन सरस, पौष्टिक, मसाला रहित, अमृतजक तथा अनुहोपक होना चाहिए। भोजन में संयम अत्यन्त आवश्यक है। अति भोजन अत्यन्त हानिकारक है। फल खाना लाभदायक होता है। आपको तभी खाना चाहिए जब कि आप वास्तव में भूले हों। कभी कभी पेट आपको खोखा देगा। आपको भूड़ी भूल लगी होगी। जब आप खाने के लिए बैठेंगे तो आपको रुचि नहीं रहेगी। ब्रह्मचर्य के लिए आहार संयम तथा उपवास बहुत ही आवश्यक है। इनको कम न समझिये।

ब्रह्मचर्य का व्रत प्रलोभनों से आपका रक्षा करेगा। यह काम को नष्ट करने के लिए शक्तिशाली अस्त्र है। यदि आप पूर्ण ब्रह्मचर्य का व्रत न ले लें तो मार आपको कभी भी प्रलोभन का शिकार बना सकता है। आपके अन्दर प्रलोभन पर संवरण करने की शक्ति नहीं रह जायगी। जो दुर्बल है वह व्रत लेने से डरता है। वह कहता है “मैं व्रत के अधीन क्यों रहूँ? मेरा संकल्प शक्तिशाली है। मैं किसी भी प्रलोभन का संवरण कर सकता हूँ। मैं उपासना कर रहा हूँ। मैं संकल्प वल का अर्जन कर रहा हूँ।” उसको बाद में पछ्ताना पड़ता है। उसको इन्द्रियों के ऊपर वश नहीं रहता! वही मनुष्य भूट मूट का वहाना करता है जिसके हृदय में काम की सच्च वृत्ति बनी हुई है। आपको विवेक, वैराग्य तथा सम्मति होनी चाहिए। तभी आपका संन्यास स्याहै तथा शाश्वत रहेगा। यदि विवेक