भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

तथा वैराग्य द्वारा आपका संन्यास उत्पन्न नहीं हुआ है तो आपका मन सदा उन वस्तुओं को प्राप्त करने की ताक में बैठता रहेगा जिनका कि उसने संन्यास नहीं किया है।

यदि आप कुछ दुर्बल हैं तो पहले एक महीने के लिए ब्रह्मचर्य का व्रत लीजिए। फिर उसको तीन महीने के लिए बढ़ा लीजिए। अब आपको कुछ ताकत मिल जायगी और आप उसको छः महीने तक के लिए बढ़ा लेंगे। धीरे धीरे आप व्रत को बढ़ाकर एक वर्ष, दो वर्ष तथा तीन वर्ष तक के लिए ले जायेंगे। अलग अलग सोइये। नित्य ही जप, कीर्तन तथा ध्यान का अभ्यास कीजिए। आप काम से घृणा करने लग जायेंगे। आप स्वतन्त्रता का अश्वत्थनीय सुख अनुभव करेंगे। आपकी ली को भी नित्य, कीर्तन, जप पूजा तथा ध्यान करना चाहिए।

वह ब्रह्मचारी धन्य है जिसने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया हो। वह ब्रह्मचारी और अधिक धन्य है जो काम-बुत्ति के उन्मूलन के लिए सच्चाई के साथ प्रयत्नशील है। वह ब्रह्मचारी तो सब से अधिक धन्य है जिसने काम का दमन कर आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त कर लिया है। वे तो इस पृथ्वी पर देवता ही हैं। उनके आशीर्वाद आप सबों को प्राप्त हों।

ब्रह्मचारियों को उपदेश

एक साधक कहता है "जैसे ही मैं ध्यान के लिए बैठता हूँ, मेरे मन से मल की परतें एक एक कर आती हैं। कभी कभी तो यह इतना शक्तिशाली होता है कि मैं यह नहीं जान पा कि मैं क्या करूँ ? मैं सत्य तथा ब्रह्मचर्य में पूर्णतया स्थित नहीं हूँ। झूठ बोलने की पुरानी आदत अभी भी

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