ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचारियों को उपदेश
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मेरे मन में बैठी हुई है। काम मुझको अधिक कष्ट दे रहा है। जी का विचार आते ही मेरा मन अधिक उद्विग्न हो जाता है। ज्यों विचार आता है त्यों ही काम के सारे संस्कार प्रगट हो जाते हैं। ज्यों ही ये विचार मेरे मन में आते हैं त्यों ही ध्यान तथा सारे दिन की शान्ति का अपहरण हो जाता है। मैं मन को समझता हूँ, उसे डराता हूँ, धमकाता हूँ परन्तु कोई फल नहीं। मेरा मन उपद्रव कर उठता है। मैं नहीं जानता कि काम को किस प्रकार से यशीभूत करूँ। चिड़चिड़ापन, अभिमान, क्रोध, लोभ, घृणा, राग इत्यादि अब भी मेरे में बैठे हुए हैं। मेरी समझ में काम ही मेरा मुख्य शत्रु है। यह बहुत सफल ही है। मैं प्रार्थना करता हूँ कि कृपया इस शत्रु को नष्ट करने के आप कुछ उपाय बतलावें।”
जब चित्त से मल बल पूर्वक निकलने लगे तो उसको बलपूर्वक दबाइये नहीं। इष्ट मन्त्र का जप कीजिए। अपने दोनों का अधिक चिंतन न कीजिये। अन्तर्निरीक्षण के द्वारा अपने दोनों को जान लेना ही पर्याप्त है। दोनों पर आत्मगुण न कीजिए। वे और भी प्रबल हो जायेंगे। “मुझमें बहुत दोष हैं” इस तरह का चिंतन न कीजिए। धनात्मक विचार का ऋणात्मक विचार के ऊपर सदा विजय होती है। सात्विक सदगुणों का अर्जन कीजिये। प्रतिपक्ष भावना के द्वारा सारे दुर्गुणों को नष्ट किया जा सकता है। यही उचित तरीका है।
संतत ध्यान तथा आत्म चिंतन के द्वारा काम दूर हो जायगा। महिलाओं से दूर भागने की कोशिश न कीजिये। तब माया भी आपके पीछे पड़ जायगी। सभी रूपों में अपनी ही आत्मा को देखने की कोशिश कीजिए।