ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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नक्षत्रचर्य साधना
को प्राप्त कर सकते हैं।
जंगली बाघ, सिंह या हाथी को पालतू बना लेना आसान है। अजगर तथा सर्प के साथ खेलना आसान है। अग्नि को निगलना तथा सागर को सोख जाना आसान है। टिपालय को उखाड़ देना आसान है। संग्राम जेष्ठ में विजयी होना आसान है। परन्तु काम-वृत्ति का दमन करना कठिन है। ईश्वर, उसके नाम तथा उसकी कृपा में विश्वास रखिये। ईश्वरीय कृपा के बिना मन से काम-वृत्ति का पूरी तरह उन्मूलन नहीं हो सकता। यदि आपको ईश्वर में श्रद्धा है तो आपको सफलता अवश्य मिलेगी। तब आप पल मात्र में ही काम को विनष्ट कर सकते हैं। ईश्वर मूंगे को बाचाल बना देता है, पंगु को पर्यंत पर चढ़ने लायक बना देता है। मात्र मानवो प्रयास ही पर्याप्त नहीं है। ईश्वरीय कृपा की आवश्यकता है। ईश्वर भी उनकी ही सहायता करता है जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं। यदि आप पूर्ण आत्मार्पण कर दें तो स्वयं आगजनी आप के लिये साधना करेंगी।
हृदित्रय बहुत ही उपद्रवी हैं। उपवास, आहार-संयम, प्राणायामः जप, कीर्तन, ध्यान, 'मैं कौन हूँ?' का विचार, प्रत्याहार, आसन, दम, वन्ध, मुद्रा, मनोान्त्रग्रह, वासनाक्षय आदि कई तरीकों से उसका नियंत्रण करना चाहिये।
पट्ट व्यक्ति कभी भी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। यदि आप ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहते हैं तो आपको चाहिए कि आप अपनी जिहा पर पूर्ण नियन्त्रण रखें। जिहा का जननेन्द्रिय में निकट मध्यस्थ है। जिहा शानेन्द्रिय है। यह जल जन्मात्रा के भौतिक ग्रंथ से उत्पन्न है। जननेन्द्रिय कमेन्द्रिय है। यह जल जन्मात्रा के राजसिक
ब्रह्मचर्य की परमावश्यकता
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अंश से पैदा होता है। उन दोनों का मूल एक ही है। यदि राजसिक अन्न के द्वारा जिह्वा उत्तेजित हुई तो साथ ही जननेन्द्रिय भी उत्तेजित हो जाती है। आहार में चुनौत तथा संयम रखना चाहिए। ब्रह्मचारी का भोजन सरस, पौष्टिक, मसाला रहित, अमृतजक तथा अनुहोपक होना चाहिए। भोजन में संयम अत्यन्त आवश्यक है। अति भोजन अत्यन्त हानिकारक है। फल खाना लाभदायक होता है। आपको तभी खाना चाहिए जब कि आप वास्तव में भूले हों। कभी कभी पेट आपको खोखा देगा। आपको भूड़ी भूल लगी होगी। जब आप खाने के लिए बैठेंगे तो आपको रुचि नहीं रहेगी। ब्रह्मचर्य के लिए आहार संयम तथा उपवास बहुत ही आवश्यक है। इनको कम न समझिये।
ब्रह्मचर्य का व्रत प्रलोभनों से आपका रक्षा करेगा। यह काम को नष्ट करने के लिए शक्तिशाली अस्त्र है। यदि आप पूर्ण ब्रह्मचर्य का व्रत न ले लें तो मार आपको कभी भी प्रलोभन का शिकार बना सकता है। आपके अन्दर प्रलोभन पर संवरण करने की शक्ति नहीं रह जायगी। जो दुर्बल है वह व्रत लेने से डरता है। वह कहता है “मैं व्रत के अधीन क्यों रहूँ? मेरा संकल्प शक्तिशाली है। मैं किसी भी प्रलोभन का संवरण कर सकता हूँ। मैं उपासना कर रहा हूँ। मैं संकल्प वल का अर्जन कर रहा हूँ।” उसको बाद में पछ्ताना पड़ता है। उसको इन्द्रियों के ऊपर वश नहीं रहता! वही मनुष्य भूट मूट का वहाना करता है जिसके हृदय में काम की सच्च वृत्ति बनी हुई है। आपको विवेक, वैराग्य तथा सम्मति होनी चाहिए। तभी आपका संन्यास स्याहै तथा शाश्वत रहेगा। यदि विवेक
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ब्रह्मचर्य साधना
तथा वैराग्य द्वारा आपका संन्यास उत्पन्न नहीं हुआ है तो आपका मन सदा उन वस्तुओं को प्राप्त करने की ताक में बैठता रहेगा जिनका कि उसने संन्यास नहीं किया है।
यदि आप कुछ दुर्बल हैं तो पहले एक महीने के लिए ब्रह्मचर्य का व्रत लीजिए। फिर उसको तीन महीने के लिए बढ़ा लीजिए। अब आपको कुछ ताकत मिल जायगी और आप उसको छः महीने तक के लिए बढ़ा लेंगे। धीरे धीरे आप व्रत को बढ़ाकर एक वर्ष, दो वर्ष तथा तीन वर्ष तक के लिए ले जायेंगे। अलग अलग सोइये। नित्य ही जप, कीर्तन तथा ध्यान का अभ्यास कीजिए। आप काम से घृणा करने लग जायेंगे। आप स्वतन्त्रता का अश्वत्थनीय सुख अनुभव करेंगे। आपकी ली को भी नित्य, कीर्तन, जप पूजा तथा ध्यान करना चाहिए।
वह ब्रह्मचारी धन्य है जिसने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया हो। वह ब्रह्मचारी और अधिक धन्य है जो काम-बुत्ति के उन्मूलन के लिए सच्चाई के साथ प्रयत्नशील है। वह ब्रह्मचारी तो सब से अधिक धन्य है जिसने काम का दमन कर आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त कर लिया है। वे तो इस पृथ्वी पर देवता ही हैं। उनके आशीर्वाद आप सबों को प्राप्त हों।
ब्रह्मचारियों को उपदेश
एक साधक कहता है "जैसे ही मैं ध्यान के लिए बैठता हूँ, मेरे मन से मल की परतें एक एक कर आती हैं। कभी कभी तो यह इतना शक्तिशाली होता है कि मैं यह नहीं जान पा कि मैं क्या करूँ ? मैं सत्य तथा ब्रह्मचर्य में पूर्णतया स्थित नहीं हूँ। झूठ बोलने की पुरानी आदत अभी भी
ब्रह्मचारियों को उपदेश
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मेरे मन में बैठी हुई है। काम मुझको अधिक कष्ट दे रहा है। जी का विचार आते ही मेरा मन अधिक उद्विग्न हो जाता है। ज्यों विचार आता है त्यों ही काम के सारे संस्कार प्रगट हो जाते हैं। ज्यों ही ये विचार मेरे मन में आते हैं त्यों ही ध्यान तथा सारे दिन की शान्ति का अपहरण हो जाता है। मैं मन को समझता हूँ, उसे डराता हूँ, धमकाता हूँ परन्तु कोई फल नहीं। मेरा मन उपद्रव कर उठता है। मैं नहीं जानता कि काम को किस प्रकार से यशीभूत करूँ। चिड़चिड़ापन, अभिमान, क्रोध, लोभ, घृणा, राग इत्यादि अब भी मेरे में बैठे हुए हैं। मेरी समझ में काम ही मेरा मुख्य शत्रु है। यह बहुत सफल ही है। मैं प्रार्थना करता हूँ कि कृपया इस शत्रु को नष्ट करने के आप कुछ उपाय बतलावें।”
जब चित्त से मल बल पूर्वक निकलने लगे तो उसको बलपूर्वक दबाइये नहीं। इष्ट मन्त्र का जप कीजिए। अपने दोनों का अधिक चिंतन न कीजिये। अन्तर्निरीक्षण के द्वारा अपने दोनों को जान लेना ही पर्याप्त है। दोनों पर आत्मगुण न कीजिए। वे और भी प्रबल हो जायेंगे। “मुझमें बहुत दोष हैं” इस तरह का चिंतन न कीजिए। धनात्मक विचार का ऋणात्मक विचार के ऊपर सदा विजय होती है। सात्विक सदगुणों का अर्जन कीजिये। प्रतिपक्ष भावना के द्वारा सारे दुर्गुणों को नष्ट किया जा सकता है। यही उचित तरीका है।
संतत ध्यान तथा आत्म चिंतन के द्वारा काम दूर हो जायगा। महिलाओं से दूर भागने की कोशिश न कीजिये। तब माया भी आपके पीछे पड़ जायगी। सभी रूपों में अपनी ही आत्मा को देखने की कोशिश कीजिए।
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इस मन्त्र “ओ३म् सच्चिदानन्द आत्मा” का जप कीजिए। याद रखिये आत्मा-लिंग रहित है। इस मन्त्र के मानसिक जप के द्वारा आपको शक्ति मिलेगी।
अभ्यास के प्रारम्भ में आपको महिलाओं से तथा महिलाओं को पुरुषों से दूर रहना चाहिये। जब आप ब्रह्मचर्य में संस्थित होगये हैं तो सावधानी के साथ महिलाओं से मिलिये तथा अपने बल की जाँच कीजिये। यादें आपका मन अब भी बहुत शुद्ध है, यदि मन में आकर्षण तथा उत्तेजन नहीं है, यदि लैंगिक विचार नहीं हैं, यदि उपरति, शम तथा दम के द्वारा मन काम नहीं करता तो आपने वास्तव में ही आध्यात्मिक बल का अर्जन कर लिया है, आपकी साधना में काफी उन्नति हुई है। अब आपको कोई भी डर नहीं है। अपने को जितेन्द्रिय योगी समझकर अपनी साधना को बन्द मत कर दीजिये। यदि आप साधना को बन्द कर देते हैं तो आपका पतन होगा। आप माह्व योगी तथा जीवनमुक्त ही क्यों न हों, सांसारिक लोगों से मिलते समय बहुत सावधान रहिये।
आत्म साक्षात्कार के मार्ग पर चलने वाले साधकों को, जो गृहस्थाश्रम में हैं, तथा जिनकी आयु ५० वर्ष की है, उन्हें चाहिये कि वे ६ महीने के लिये एक बार अपने पति या पत्नी से सारा सम्पर्क दूर रखें। उनको पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। तभी वे इस जन्म में आत्म साक्षात्कार को प्राप्त कर सकते हैं। आध्यात्मिक मार्ग में अधूरी साधना को स्थान नहीं है।
ब्रह्मचारियों को पथ-प्रदर्शन आप महीनों तथा वर्षों तक लैंगिक न्यमन्यों को रोक
ब्रह्मचारियों को पय-प्रदर्शन
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मकते हैं, परंतु आपमें स्त्रियों के प्रति काम-वृत्ति तथा आकर्षण भी नहीं रहने चाहिये। स्त्रियों के साथ रहने पर भी आपके अन्दर खुरे विचार नहीं आने चाहिये। यदि इस दिशा में आपको सफलता मिल गई है तो आप पूर्ण ब्रह्मचर्य में संस्थित होंगये हैं। आप खतरों के कटिबन्ध को पार कर गये हैं। स्त्रियों की ओर देखने में कोई हानि नहीं है परंतु दृष्टि में शुद्धता होनी चाहिये। आपमें आत्मभाव होना चाहिये। युवती स्त्री की ओर देखते समय ऐसा अनुभव कीजिये कि “हे मां जगज्जननी आपको नमस्कार है। आप सयों की मां हैं। मुझे प्रलोभन में न डालिये। मैंने माया के सारे रहस्यों का समझ लिया है।” इन नाम रूपों के पर सर्वशक्तिशाली करुणामय भगवान है। यह सब नक्षत्र है। ईश्वर सौन्दर्यों का सौन्दर्य है। वह श्रुत्य सौन्दर्य का स्वरूप है। वह सौन्दर्य का स्रोत है। सतत ध्यान के द्वारा मैं उस सौन्दर्यों के सौन्दर्य का गान्धार करूँगा।” जब भी किसी मुन्दर रूप को आप देखें तो आपमें भक्ति तथा स्तुति की भावना जाग्रत होनी चाहिये। आपको उस रूप के लघा का स्मरण हो जाना चाहिये। तब आप किसी भी प्रलोभन में न पड़ सकेंगे। यदि आप वेदान्त के साधक हैं तो ऐसा विचार कीजिये कि सब कुछ आत्मा ही है। नाम रूप भ्रामक हैं। ये माया के द्वारा उत्पन्न होते हैं। आत्मा के अतिरिक्त उनका अपना अलग अस्तित्व नहीं हैं।
गाथकों को स्त्री सम्बन्धी बातें नहीं करनी चाहिये। उन्हें स्त्रियों के विययमें सोचना भी नहीं चाहिये। खुरे विचारों के आने पर आपने मन में आपने दृष्ट देवता की मूर्ति को लादिये। उस रूप से मंत्र का जप कीजिये। जानवरों के
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मैथुन को देखकर यदि आपके मन में काम-वासना उत्पन्न हो तो आपमें अभी भी काम वासना बनी हुई है। कुछ लोग इतने कामुक तथा दुर्बल हैं कि स्त्री का विचार, दर्शन तथा स्पर्श के द्वारा ही उनका वीर्य-पतन हो जाता है। उनकी अवस्था दयनीय है।
उन्नत साधकों को भी सावधान रहना चाहिये। उन्हें भी स्त्रियों के साथ अधिक स्वतंत्रता नहीं रखनी चाहिये। उन्हें नहीं समझना चाहिये कि वे योग में निपुण हो गये हैं। एक प्रतिष्ठावान सन्त को भी पति होना पड़ा था। वे महिलाओं के साथ रहते थे, उनकी बहुत सी महिला शिष्यायें थीं। उनसे पैर दबवाते थे। उनका पतन हो गया।
दूसरा महात्मा जिनको कि उनके भक्त भगवान कृष्ण का अवतार मानते थे योग-प्रष्ट बन गया। वह भी महिलाओं के साथ स्वतंत्रता रखते थे तथा पाप-कृत्य कर बैठे। कितना दुर्भाग्य है। कितनी कठिनाई से साधक साधना की सीढ़ी पर चढ़ते हैं और असावधानी के कारण अपनी सारी कमाई को खो देते हैं। जिहा का दमन कीजिये। तभी काम को वश में करना आसान हो सकेगा। स्वादिष्ट राजसिक अन्न कामोत्तेजक होते हैं। आप इस भाव के अर्जन में कि सारी स्त्रियां आपकी मां तथा बहनें हैं, कई बार असफल हो सकते हैं। परंतु कोई बात नहीं। गंभीरता पूर्वक अभ्यास करते जाइये। आप अन्ततः सफल होंगे। एक विद्यार्थी मेरे पास लिखता है “मलिन मांस तथा चमड़ा मुझको बहुत ही शुद्ध तथा मुन्दर प्रतीत होता है। मैं बहुत ही कामुक हूँ। मैं मानुषात्र अर्जन करने की कोशिश करना हूँ। मैं स्त्री को देवी मानकर मानसिक
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नमस्कार करता हूँ। परंतु फिर भी मैं अत्यन्त कामुक हूँ। अब मैं क्या करूँ ?” स्पष्ट है कि उसके मन में वैराग्य तथा विवेक नाम मात्र को भी नहीं है। पुराने संस्कार तथा वासना अत्यन्त बलशाली हैं।
अस्त्रियंजर तथा मुर्दा शरीर की स्मृति से आपकी वैराग्य आवेगा। इस शरीर की उत्पत्ति मल से ही हुई है। यह मल से पूर्ण है तथा अन्त में यह भस्मीभूत हो जाता है। यदि आप यह याद रखें तो आपके मन में वैराग्य का प्रादुर्भाव होगा। संसार के दुखों का स्मरण कीजिये। विषयों की असत्यता तथा वन्धनों पर विचार कीजिये। किसी भी तरीके का अभ्यास कीजिये। पुराने संस्कार तथा वासना कितने ही बलशाली क्यों न हों नियमित ध्यान, तप, प्रार्थना, मासिक आहार, सत्संग, शीर्षासन, मर्यादामन, स्वाध्याय, “मैं कौन हूँ ?” का विचार तथा किसी पवित्र नदी के तट पर तीन महीनों तक एकान्तवास के अभ्यास के द्वारा वे विनष्ट हो जायेंगे। अनात्मक की विजय अणुआत्मक के ऊपर होती है। आपको कभी भी हिंमत न दारनी चाहिये। ध्यान में निमग्न हो जाइये, मार को नष्ट कीजिये। संग्राम में विजयी बनिये। तेजस्वी योगी बनिये। आप शुद्ध आत्माहैं।
हे विश्व राजन्। इसका अनुभव कीजिये।
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पीड़ित नहीं होते।
२. ब्रह्मचारियों को पान सिगरेट, तम्बाकू, बाप नख, काफी आदि का पूर्णतः परित्याग करना चाहिये। बीड़ी से निकोटिन जहर फैलता है, हृदय को हानि पहुँचती है, स्नायु सम्बन्धी रोग तथा नेत्र सम्बन्धी रोग होते रहते हैं।
३. जिस मनुष्य में लिंग-विचार गहरा गढ़ा हुआ वह है करोड़ों वर्षों में भी वेदान्त को समझकर उसका साक्षात्कार नहीं कर सकता।
४. नारद भक्ति सूत्र में कहते हैं "ये वृत्तियां (कामुक) पहले तो लहरियों के रूप में उत्पन्न होती हैं परंतु कुसंगति के कारण सागर के रूप में परिकंचित हो जाती हैं। सूत्र-४५।" अतः कुसंगति का त्याग कीजिये।
५. विपरीत लिंग वाले व्यक्ति को देखने पर उससे बात करने को इच्छा होगी। बात करने के बाद छूने की इच्छा होगी। अंततः मन मलिन हो जायगा।
६. अज्ञानियों के काम को दूर करने के लिये तथा ब्राह्मी स्थिति को पाने के लिये ब्रह्मचर्य से बंदकर कोई भी महौषधि नहीं है।
७. दो प्रकार के ब्रह्मचारी पाये जाते हैं—नेष्ठिकाः जो आजीवन ब्रह्मचारी रहता है तथा उपाकुर्वन् : जो अल्पयुवन के उपरान्त ग्रहस्थाश्रम में प्रवेश करता है।
८. स्वप्नदाण्ड होने पर प्रातः डुबकी लगाकर स्नान कीजिये। बीस बार प्राणायाम कीजिये। १०८ बार गायत्री मंत्र ॥ जप कीजिये। सूर्य से प्रार्थना कीजिये "हे सूर्य, मेरी खोह शक्ति मुझको लीटा दो पुनर्माधव इन्द्रियम्।"
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६. हे श्याम ! आप नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं । आपने मन, वचन तथा कर्म से आजीवन ब्रह्मचर्य पालन का व्रत लिया है । सूर्य भी आपके सामने कम्पित होगा । ब्रह्मचर्य शक्ति के द्वारा आप सूर्य का भेदन करेंगे । आप महान् हैं ।
१०. सक्रियों प्रदीप को फूल समझ कर उसी में श्रपनी जान को खो बैठती हैं । उसी प्रकार कामुक नर नारी शारीरिक सुन्दरता के द्वारा आकृष्ट होकर काममि में ही जल मरते हैं ।
११. ध्वनि के द्वारा हिरण्य, स्पर्श के द्वारा हाथी, रूप के द्वारा पत्तिंगे, स्वाद के द्वारा मछली, गंध के कारण मक्खी फन्दे में आ पड़ती हैं । जब एक ही इन्द्रिय में इतनी शक्ति है तो मम्मिलित पांचों इन्द्रियों में कितनी शक्ति होगी ।
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जाती है। क्या आप इन विद्युत कणों से कुछ पा सकते हैं? क्या आप ब्रह्मचर्य का पालन कर आप्यात्मिक शक्ति का अर्जन करेंगे। प्रकृति आपकी सबसे अच्छी गुरु तथा पथ-प्रदर्शक है।
१४. अश्लील संगीत मन में बहुत ही बुरा तथा गहरा नरकार डाल देता है। साधकों को ऐसे स्थानों से दूर रहना चाहिये जहाँ कि अनैतिक संगीत गाये जाते हो।
१५. अश्लील चित्र, अश्लील शब्द, प्रेम कहानियाँ बाला उपन्यास—इन सब के द्वारा कामोत्तेजन होता तथा मनुष्य के हृदय में कुलित इत्तियाँ पैदा होती हैं। किन्तु भगवान् कृष्ण या भगवान् राम या भगवान् बुद्ध के सुन्दर चित्र तथा मूर्तदान, तुलसीदास तथा त्यागराज के सुन्दर संगीत को सुनकर शुभ-इत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। प्रेमाभू बहते तथा मन भाव समाधि में मग्न जाता है क्या आप दोनों के भेदों को अच्छी प्रकार से समझ गये हैं?
१६. बालकपन में बच्चे तथा बच्चियों में लिंग सम्बन्धी अधिक विवेद नहीं होता। कुमारान्वथा में आते ही उनमें बड़ा परिवर्तन हो जाता है। भावनायें, विचार, हावभाव, शरीर, बातें जैहरा तथा गति इन सबों में श्रन्तर हो जाता है।
१७. काशी के हनुमान घाट पर दो लड़कियाँ बूबने लगीं। दो युवकों ने तुरंत उनको चन्ना लिया। एक युवक ने लड़की से विवाह का प्रस्ताव किया। दूसरे ने कहा “मैंने तो अपना कर्त्तव्य कर दिया। ईश्वर ने मुझको सेवा करने का मौका प्रदान किया था।” उग
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२०. जिस तरह ग्वनिज द्रव्यों को गुड़ करने के लिये उसे घोंकनी से फ्रूंकते हैं ठीक उसी तरह प्राण के नियोध से इन्द्रियों को जला देते हैं। अतः नियमित प्राणायाम का अभ्यास कीजिये। यह महान् शोधक है।
ब्रह्मचर्य के लिये सहायक
धेरे पास आनेकानेक हतोत्साह, निराश युवकों की दयनीय कहानियाँ के पत्र आते हैं। साहित्य तथा फिल्म ने क्षेत्र में हाल में बहुत ही अशलीलताश्रो का समावेश हुआ है। युवकों की दयनीय दशा में बुद्धि का यही कारण है। वीर्यनाश से उनके मन में बहुत भय उत्पन्न होना है। शरीर दुर्बल हो जाता है। याददाश्त कम हो जाती है। न्हेरा कुरूप हो जाता है। तथा युवक अपनी दयनीय स्थिति को संभालने में असमर्थ होते हैं। यदि निम्नांकित उपदेशों में से कुछ का भी पालन किया जाय तो उससे जीवन के प्रति सम्यक् दृष्टिकोण का विकास होगा। तथा वह अनुशासित आध्यात्मिक जीवन व्यतीत कर सकता है।
यदि वीर्य पतन वारम्बार होता है तो चिन्ता न कीजिये।
कञ्ज के विषय में एनिमा अत्यावश्यक है विरेचकों का प्रयोग अधिक लाभदायक नहीं है क्योंकि उसके द्वारा शरीर में गर्मा की बुद्धि होती है। शयन करने के पहले मल मत्र का परित्याग कर लीजिये।
सदा कौपीन पहनिये।
मदान्चार के नियमों का पालन कीजिये। सदा ईश्वर की याद रखिये। एक दिन के लिये उपवास कीजिये।
नींबू या नारंगी के रस को पानी में मिलाकर पीजिये। एक सप्ताह तक फल का आहार कीजिये। दूसरे सप्ताह में फल व दूध का तब तीसरे सप्ताह में दिन में अपना साधारण भोजन कीजिये। और रात्रि में फल तथा दूध का। जब तक कि आप अपने भोजन के पुराने तरीके पर न आ जायें एनिमा का प्रयोग करते रहिये।
ब्रह्मचर्य सुधा बड़ा लाभदायक आयुर्वेदिक शौपथि है।
कम सोह्ये। बाईं करवट सोह्ये। पीठके बल या पैट के बल न सोह्ये। चार बजे प्रातः उठिये। आध्यात्मिक माधना में लग जाह्ये। उन सभी वस्तुओं का पूर्णतः परित्याग कीजिये जिनसे कामोत्तेजन हो।
रोग का पूर्ण निवारण १ से ६ महीने तक में हो सकता है। यदि रोग पुराना है तो निवारण भी अधिक समय में होगा। प्रकृति के कार्य धीमे हैं, परन्तु हैं पक्के। कामुक विचारों से आक्रान्त होने पर आपको उनके बदले दिव्य विचारों को प्रभव देना होगा।
निम्नांकित नियम उन सभी लोगों के लिये लागू हैं जो स्वप्नदोष या किसी भी बुरी आदत के शिकार बने हुये हैं।
१. सामान्य
१. कुमंगति, गपशप, ड्रामा, सिनेमा, उपन्यास का परित्याग कीजिये। विपरीत लिंग वाले से अधिक न मिलिये। यदि यह अनिवार्य हो तो दिव्य भाव रखिये।
२. अपनी आवश्यकताओं को अधिकारिक क्रम रखिये। वारंवार दर्पण में चेहरा न देखिये। अनुशामित तथा धमपुत्र जीवन बिताह्ये।
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३. जानवरों तथा पशुओं के मैथुन को न देखिये ।
४. अधिक साङ्किल न चलाइये ।
५. विलास एवं आराम का प्रेमी न बनिये । आलस्य को दूरकर सदा किसी न किसी उपयोगी काम में लगे रहिये । आपका मन सदा संलग्न रहे—आध्यात्मिक साहित्य के अध्ययन तथा अन्य शुभ कर्मों में । आलस्य में समय न गंवाइये ।
६. त्रिम कार्य को आप करें वह आपके आनन्द का स्रोत हो । आप अपने काम में सुख का अनुभव कीजिये । उसे आप भार के रूप में न कीजिये । जब मन किसी कार्य को भार समझता है तो तब वह किसी अन्य वस्तु से सुख प्राप्त करना चाहता है । सदा सुख पूर्वक अनायास काम करते रहिये जिससे मन को पाप-कृत्यों की ओर जाने का मौका भी न मिले । ईश्वर के लिये काम कीजिये । तब सभी कार्य सुखप्रद हो जायेंगे । शारीरिक श्रम का कार्य भी कीजिये । परन्तु अपने को थका न डालिये । कर्म को अपनी लीला बना डालिये । तब आप विना किसी चिन्ता तथा शोक के काम करते रहेंगे ।
७. आसन कीजिये । (शीर्षासन, सर्वांगासन तथा मिडामन ) गहरी स्वास ले लीजिये भक्ति का प्राणायाम का अभ्यास कीजिये । मीलों तक दहलिये । खेल में भाग लीजिये ।
८. सदा टेंडे जल के द्वारा स्नान कीजिये । मंत्र तथा पैशन की वस्तुओं का प्रयोग न कीजिये । नृत्य तथा संगीत-पार्टियों में भाग न लीजिये । गाना न गाइये आप कीर्तन में भाग ले सकते हैं । परन्तु अपनी संगीत-कला का प्रदर्शन न कीजिये ।
आवश्यक
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६. धूम्रपान मादक द्रव्य तथा आमिषाहार का परित्याग कीजिये।
१०. चाय, काफी, खटाई, अधिक मिठाई तथा चीनी का त्याग कीजिये। कभी कभी (सप्ताह में एक बार) उपवास कीजिये। उस दिन जल भी न पीजिये। बिना अदरख डाले दूध भी न पीजिये। सुस्वादु भोजन, चरती आदि का परित्याग कीजिये।
आवश्यक
यह दुर्बलता दूर होजायगी। इसके लिये उद्दिष्ट या चिन्ताग्रस्त न बनिज्ये। चिन्ता के द्वारा आप और अधिक दुर्बल बन जायेंगे। भूत से शिष्टा लीजिये। तथा लाभ उठाइये। भविष्य की चिन्ता न कीजिये। अपने हृदिकोण को बदल डालिये। विचार का अभ्यास कीजिये। ब्रह्मचर्य के लाभ पर ध्यान कीजिये। हनुमान, भीष्म, तथा अन्य अश्वमेध ब्रह्मचारियों के जीवन पर ध्यान दीजिये। विषय-परायण जीवन से होने वाली हानियाँ—स्वास्थ्य की हानि, लज्जा, रोग तथा मृत्यु पर विचार कीजिए। आप विश्व-पिता की सन्तान हैं। सारा सुख आपके अन्दर ही है। नियम वस्तु में लेथ मात्र भी सुख नहीं है। अपने को शरीर से पृथक् कीजिए। ईश्वर से तादात्म्य सम्बन्ध स्थापित कीजिए। यदि आपका मन शुद्ध तथा स्वस्थ है तो आपका शरीर भी शुद्ध तथा स्वस्थ रहेगा। अतः भूत को भूल जाएं। नवीन, श्रेयस्कर धर्म तथा अध्यात्म के जीवन का अवलंबन कीजिए। दिव्य जीवन का आस्वादन करना गौरविए। अधिक साधना कीजिए। आप पूर्णतः परिवर्तित तथा दिव्य बन जायेंगे।
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ब्रह्मचर्य साधना
स्वतंत्र के समय
भूत की आदतों के फलस्वरूप यदि आप किसी स्वतंत्र में हो तो निम्नांकित उपदेशों का पालन कीजिए।
१. आपके में न रहिए। दूसरों की संगति में रहिए।
२. जप तथा कीर्तन।
३. जोरों से कई बार ओम् का जप कीजिए।
४. कुछ दूर तक जोरों से दौड़िए। शीर्षासन कीजिए।
५. विचार कीजिए “यह कामना किसमें उठती है ?” मन तथा शरीर से अपने को प्रथम कीजिए।
६. अपनी देवी प्रकृति का निश्चय कीजिए। आप आत्मा हैं। मन आपका नीकर है। मन के कार्यों का शास्त्री बनिऐ। कामनाओं को प्रारम्भ में ही कुचल डालिए। उनके प्रति झुकिए नहीं।
७. ईश्वर से प्रार्थना कीजिए। प्रेरणात्मक स्तोत्रों का पाठ कीजिए।
८. अपने भीतर ईश्वरों की स्थिति का भान कीजिए।
९. किसी प्रेरणात्मक आध्यात्मिक ग्रन्थ के अध्ययन में लग जाइए।
१०. इससे आपको बल मिलेगा तथा आप पतन से बच जायेंगे।
ऊर्द्धवरेता योगी
मन, प्राण तथा वीर्य एक ही हैं। मन तथा प्राण में दूध तथा जल जैसा संबंध है। यदि मन को नियन्त्रित कर लिया गया तो प्राण तथा वीर्य स्वयं निरुद्ध हो जाते हैं।
ऊर्द्धवरेता योगी
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जो प्राण को नियंत्रित करता है वह मन तथा वीर्य की गति को भी नियंत्रित कर लेता है । यदि शुद्ध विचार, सर्वांगमान, शोषासन तथा प्राणायाम के अभ्यास से वीर्य को नियंत्रित कर उसे मस्तिष्क की ओर ऊर्द्ध प्रवाहित किया गया तो मन तथा प्राण स्वतः निरुद्ध हो जायेंगे ।
जिसने मन पर विजय पाली उसने प्राण को भी वर्शा-भूत कर लिया । मन इन दो वस्तुओं—प्राण स्पंदन तथा वासन के द्वारा गतिशील बनता है । यदि इनमें से किसी एक को भी मार दिया गया तो दूसरा स्वतः मर जाता है । जहां मन को लीन किया जाता है वहीं प्राण भी निरुद्ध होता है, तथा जहां प्राण को स्थिर किया जाता है वहां मन लीन हो जाता है । मन तथा प्राण मनुष्य तथा उसकी छाया के समान निकट संबंध रखते हैं । यदि मन तथा प्राण नियंत्रित न किये तो सारे इन्द्रिय—हानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय अपने व्यापारों में संलग्न रह गये ।
वह अखण्ड ब्रह्मचारी जिसने बारह वर्षों तक वीर्य की एक बूंद भी गिरने न दिया है, बिना प्रयास के ही समाधि में प्रवेश करेगा । प्राण तथा मन उसके पूर्ण नियंत्रण में हैं । बालब्रह्मचर्य तथा अखण्ड ब्रह्मचर्य पर्यायवाची हैं । अखण्डब्रह्मचारी की धारणाशक्ति, स्मृतिशक्ति तथा विचारशक्ति प्रबल होती है । अखण्डब्रह्मचारी को मनन तथा निदिध्यासन की भी आवश्यकता नहीं है । यदि एक बार भी वह महावाक्य का अवगण कर लेगा तो शीघ्र ही वह आत्मसाक्षात्कार या ब्रह्मानुभव प्राप्त कर लेगा । उसकी बुद्धि शुद्ध तथा उसकी समझ अत्यन्त ही स्पष्ट है । आप अखण्ड ब्रह्मचारी बन सकते हैं, यदि आप सच्चा प्रयास करें । केवल जरा रखने, कपाल तथा शरीर में चार लगाने से कोई
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ब्रह्मचर्य साधना
अखंड ब्रह्मचारी नहीं बनता। वह ब्रह्मचारी जिसने शरीर तथा इन्द्रियों का तो दमन कर लिया है परंतु सदा काम विचारों का चिंतन किया करता है, दंभी है। वह कभी भी भ्रष्टाचारी बन सकता है।
प्रतिक्रिया से आपको बहुत सावधान रहना होगा। जिन इन्द्रियों को आपने कुछ महीने या वर्ष तक नियंत्रण में रखा है वे उपद्रवी बन सकती हैं, यदि आपमें सावधानी नहीं रही तो समय मिलने पर वे उपद्रव करके आपको घसीट लाती हैं। कुछ लोग एक या दो वर्ष तक ब्रह्मचर्य का अभ्यास कर लेने के बाद और भी अधिक कामुक शक्त कर अत्यधिक शक्ति को विनाष्ट कर डालते हैं।
योगिक विज्ञान के अनुसार वीर्य सूक्ष्म रूप से समस्त शरीर में व्याप्त है। कामुक इति तथा कामोत्तेजन द्वारा उसे स्त्रीचा तथा स्थूल रूप में परिणत किया जाता है। ऊर्ध्वरेता बनने के लिए उस स्थूल वीर्य को जो पहले से बन चुका है रोकना ही भर पर्याप्त नहीं है, वरन् उसके निर्माण कार्य को रोकना तथा शरीर प्रणाली में विलीन करना भी आवश्यक है। सच्चे ऊर्ध्वरेता मनुष्य के शरीर पक्ष के समान सुवासित होता है। जिसमें स्थूल वीर्य है वह बकरी के समान महँकता है। प्राणायाम के अभ्यास से वीर्य सूख जाता है। वीर्य शक्ति मस्तिष्क को उज्जीवित करता है। यह ओजस्व शक्ति के रूप में स्पंदित होती है तथा अमृत के रूप में निकलती है।
उन योगियों की जै हो जो ऊर्ध्वरेता बन चुके हैं, तथा जो स्वरूप में निवास कर रहे हैं। हम सभी शम, दम, विवेक, विचार, चैराग्य, प्राणायाम, अप, ध्यान के अभ्यास से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। हमारे हृदयों का अन्त-
फैशन-भयंकर अभिशाप
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बाँसी हमें इन्द्रियों तथा मन को वशीभूत करने के लिए शक्ति प्रदान करे। हम सभी श्री शंकर तथा ज्ञानदेव की भांति पूर्ण ऊर्द्धवरेता योगी बन जायें। उनके आशीर्वाद हम सबों को प्राप्त हो !
फैशन—भयंकर अभिशाप
ब्रह्मचारी फैशन से दूर रहे। उनके लाभ के लिए ही वह लेख दिया जा रहा है। लोग फैशन के लिए मर रहे हैं। नर नारी सभी फैशन के गुलाम बन चले हैं। गाउन या वस्त्र की काट छोट में जरा सी गलती हो जाने पर लन्दन अथवा पेरिस के दण्डियों पर कोर्ट में नुक्सानी का सुकदमा पेश किया जाता है। लाहौर अथवा रावल पिंडी भी आजकल पेरिस बन चले हैं। आप शाम को वहां पर विविध प्रकार के फैशन को देख सकते हैं। अर्द्धनंगापन ही फैशन का रहस्य है। वे विज्ञान तथा स्वास्थ्य के नाम पर शरीर को खुला छोड़ते हैं। आधी छाती, आधे हाथ, आधे पैर जरूर ही खुले रहने चाहियें। यही फैशन है। अपने कंघ पर भी उनका पूर्ण नियन्त्रण है। यही उनकी भिन्नि है। हेयर ड्रेसिंग सैलून में जैसे चाहें अपने वालों को कटवाकर वे सुसज्जित कर सकते हैं। फैशन मनुष्य की कामुकता की उद्दीप्त करता है।
लाहौर में गरीब महिला भी मामूली फराक के लिए ५) रुपया गिलाई चार्ज देती है। वह इस बात की जरा परवा नहीं करता कि उसका पति किम प्रकार से इतने पैसे की व्यवस्था कर सकेगा। विचारा पति ! काम का गुलाम ! दयनीय जीव ! वह जहां तहां से उधार लेकर गुस्सवारी के द्वारा किसी न किसी तरह अपनी स्त्री को प्रसन्न
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ब्रह्मचर्ये साधना
फरता है—बाहर से तो मुस्कराता है परन्तु अन्तः क्रोध की आग घघकती है। वह अपने अन्तःकरण मारता है। अपनी बुद्धि का दमन करता है। तब भ्रमित होकर इस संसार में विचरण करता है तथा अगुरे कार्यों के फल स्वरूप वह भगन्दर आदि रोगों शिकार हो जाता है। तकलीफ होने पर वह रोता है—“मैं महान्, पापी हूँ! मैं इस दुःख को सहन नहीं सकता। मैंने अपने पूर्व जन्म में बहुत से पाप किये हैं हे प्रभु! क्षमा कर, रक्षा कर।” परन्तु इसी जन्म में अपन भाग्य बदने के लिए वह रंजमात्र भी पुरुषार्थ करत नहीं चाहता।
कैशनबल लोगों के वस्त्रों से छुट्टे हुए कपड़े के टुकड़ों से, सारी दुनियाँ को ढँका जा सकता है। फैशन में अत्यधिक धन का अपव्यय होता है। मनुष्य को इस जगत में बहुत ही कम वस्त्र की आवश्यकता है। एक जोड़ा साधारण वस्त्र, चार रोटी तथा एक लोटा पानी। यदि फैशन के रूप्यों को सत्कर्मों में लगाया जाय—दान, समाज सेवा, आदि—तो निश्चय ही मनुष्य दिव्य बन जायगा। वह नित्य शांति तथा सुख का भोग करेगा। परन्तु आप कैशनबल लोगों में क्या देखते हैं? अशांति, दुःख, भय, निराशा, तथा पीला चेहरा। वे रेशमीकपड़े, तथा अपट्टुडेड पोशाकों में हो सकते हैं परन्तु उनके चेहरों में प्रसन्नता नहीं, कुरूपता है। शोक, लोभ, काम, तथा धृष्टा के क्रीदों ने उनके हृदयों को जर्जर बना डाला है।
यदि इंगलैण्ड के बैरन (जमींदार) को अपने भूट तथा हैट को उतारने के लिए कहिये, जिस समय वह हिंदू मन्दिर में प्रवेश कर रहा हो, तो वह अनुभव करता है