ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचारियों को पय-प्रदर्शन
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मकते हैं, परंतु आपमें स्त्रियों के प्रति काम-वृत्ति तथा आकर्षण भी नहीं रहने चाहिये। स्त्रियों के साथ रहने पर भी आपके अन्दर खुरे विचार नहीं आने चाहिये। यदि इस दिशा में आपको सफलता मिल गई है तो आप पूर्ण ब्रह्मचर्य में संस्थित होंगये हैं। आप खतरों के कटिबन्ध को पार कर गये हैं। स्त्रियों की ओर देखने में कोई हानि नहीं है परंतु दृष्टि में शुद्धता होनी चाहिये। आपमें आत्मभाव होना चाहिये। युवती स्त्री की ओर देखते समय ऐसा अनुभव कीजिये कि “हे मां जगज्जननी आपको नमस्कार है। आप सयों की मां हैं। मुझे प्रलोभन में न डालिये। मैंने माया के सारे रहस्यों का समझ लिया है।” इन नाम रूपों के पर सर्वशक्तिशाली करुणामय भगवान है। यह सब नक्षत्र है। ईश्वर सौन्दर्यों का सौन्दर्य है। वह श्रुत्य सौन्दर्य का स्वरूप है। वह सौन्दर्य का स्रोत है। सतत ध्यान के द्वारा मैं उस सौन्दर्यों के सौन्दर्य का गान्धार करूँगा।” जब भी किसी मुन्दर रूप को आप देखें तो आपमें भक्ति तथा स्तुति की भावना जाग्रत होनी चाहिये। आपको उस रूप के लघा का स्मरण हो जाना चाहिये। तब आप किसी भी प्रलोभन में न पड़ सकेंगे। यदि आप वेदान्त के साधक हैं तो ऐसा विचार कीजिये कि सब कुछ आत्मा ही है। नाम रूप भ्रामक हैं। ये माया के द्वारा उत्पन्न होते हैं। आत्मा के अतिरिक्त उनका अपना अलग अस्तित्व नहीं हैं।
गाथकों को स्त्री सम्बन्धी बातें नहीं करनी चाहिये। उन्हें स्त्रियों के विययमें सोचना भी नहीं चाहिये। खुरे विचारों के आने पर आपने मन में आपने दृष्ट देवता की मूर्ति को लादिये। उस रूप से मंत्र का जप कीजिये। जानवरों के