ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
मैथुन को देखकर यदि आपके मन में काम-वासना उत्पन्न हो तो आपमें अभी भी काम वासना बनी हुई है। कुछ लोग इतने कामुक तथा दुर्बल हैं कि स्त्री का विचार, दर्शन तथा स्पर्श के द्वारा ही उनका वीर्य-पतन हो जाता है। उनकी अवस्था दयनीय है।
उन्नत साधकों को भी सावधान रहना चाहिये। उन्हें भी स्त्रियों के साथ अधिक स्वतंत्रता नहीं रखनी चाहिये। उन्हें नहीं समझना चाहिये कि वे योग में निपुण हो गये हैं। एक प्रतिष्ठावान सन्त को भी पति होना पड़ा था। वे महिलाओं के साथ रहते थे, उनकी बहुत सी महिला शिष्यायें थीं। उनसे पैर दबवाते थे। उनका पतन हो गया।
दूसरा महात्मा जिनको कि उनके भक्त भगवान कृष्ण का अवतार मानते थे योग-प्रष्ट बन गया। वह भी महिलाओं के साथ स्वतंत्रता रखते थे तथा पाप-कृत्य कर बैठे। कितना दुर्भाग्य है। कितनी कठिनाई से साधक साधना की सीढ़ी पर चढ़ते हैं और असावधानी के कारण अपनी सारी कमाई को खो देते हैं। जिहा का दमन कीजिये। तभी काम को वश में करना आसान हो सकेगा। स्वादिष्ट राजसिक अन्न कामोत्तेजक होते हैं। आप इस भाव के अर्जन में कि सारी स्त्रियां आपकी मां तथा बहनें हैं, कई बार असफल हो सकते हैं। परंतु कोई बात नहीं। गंभीरता पूर्वक अभ्यास करते जाइये। आप अन्ततः सफल होंगे। एक विद्यार्थी मेरे पास लिखता है “मलिन मांस तथा चमड़ा मुझको बहुत ही शुद्ध तथा मुन्दर प्रतीत होता है। मैं बहुत ही कामुक हूँ। मैं मानुषात्र अर्जन करने की कोशिश करना हूँ। मैं स्त्री को देवी मानकर मानसिक