ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
२०. जिस तरह ग्वनिज द्रव्यों को गुड़ करने के लिये उसे घोंकनी से फ्रूंकते हैं ठीक उसी तरह प्राण के नियोध से इन्द्रियों को जला देते हैं। अतः नियमित प्राणायाम का अभ्यास कीजिये। यह महान् शोधक है।
ब्रह्मचर्य के लिये सहायक
धेरे पास आनेकानेक हतोत्साह, निराश युवकों की दयनीय कहानियाँ के पत्र आते हैं। साहित्य तथा फिल्म ने क्षेत्र में हाल में बहुत ही अशलीलताश्रो का समावेश हुआ है। युवकों की दयनीय दशा में बुद्धि का यही कारण है। वीर्यनाश से उनके मन में बहुत भय उत्पन्न होना है। शरीर दुर्बल हो जाता है। याददाश्त कम हो जाती है। न्हेरा कुरूप हो जाता है। तथा युवक अपनी दयनीय स्थिति को संभालने में असमर्थ होते हैं। यदि निम्नांकित उपदेशों में से कुछ का भी पालन किया जाय तो उससे जीवन के प्रति सम्यक् दृष्टिकोण का विकास होगा। तथा वह अनुशासित आध्यात्मिक जीवन व्यतीत कर सकता है।
यदि वीर्य पतन वारम्बार होता है तो चिन्ता न कीजिये।
कञ्ज के विषय में एनिमा अत्यावश्यक है विरेचकों का प्रयोग अधिक लाभदायक नहीं है क्योंकि उसके द्वारा शरीर में गर्मा की बुद्धि होती है। शयन करने के पहले मल मत्र का परित्याग कर लीजिये।
सदा कौपीन पहनिये।
मदान्चार के नियमों का पालन कीजिये। सदा ईश्वर की याद रखिये। एक दिन के लिये उपवास कीजिये।