भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 189

१७४

ब्रह्मचर्य साधना

पीड़ित नहीं होते।

२. ब्रह्मचारियों को पान सिगरेट, तम्बाकू, बाप नख, काफी आदि का पूर्णतः परित्याग करना चाहिये। बीड़ी से निकोटिन जहर फैलता है, हृदय को हानि पहुँचती है, स्नायु सम्बन्धी रोग तथा नेत्र सम्बन्धी रोग होते रहते हैं।

३. जिस मनुष्य में लिंग-विचार गहरा गढ़ा हुआ वह है करोड़ों वर्षों में भी वेदान्त को समझकर उसका साक्षात्कार नहीं कर सकता।

४. नारद भक्ति सूत्र में कहते हैं "ये वृत्तियां (कामुक) पहले तो लहरियों के रूप में उत्पन्न होती हैं परंतु कुसंगति के कारण सागर के रूप में परिकंचित हो जाती हैं। सूत्र-४५।" अतः कुसंगति का त्याग कीजिये।

५. विपरीत लिंग वाले व्यक्ति को देखने पर उससे बात करने को इच्छा होगी। बात करने के बाद छूने की इच्छा होगी। अंततः मन मलिन हो जायगा।

६. अज्ञानियों के काम को दूर करने के लिये तथा ब्राह्मी स्थिति को पाने के लिये ब्रह्मचर्य से बंदकर कोई भी महौषधि नहीं है।

७. दो प्रकार के ब्रह्मचारी पाये जाते हैं—नेष्ठिकाः जो आजीवन ब्रह्मचारी रहता है तथा उपाकुर्वन् : जो अल्पयुवन के उपरान्त ग्रहस्थाश्रम में प्रवेश करता है।

८. स्वप्नदाण्ड होने पर प्रातः डुबकी लगाकर स्नान कीजिये। बीस बार प्राणायाम कीजिये। १०८ बार गायत्री मंत्र ॥ जप कीजिये। सूर्य से प्रार्थना कीजिये "हे सूर्य, मेरी खोह शक्ति मुझको लीटा दो पुनर्माधव इन्द्रियम्।"