ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
अखंड ब्रह्मचारी नहीं बनता। वह ब्रह्मचारी जिसने शरीर तथा इन्द्रियों का तो दमन कर लिया है परंतु सदा काम विचारों का चिंतन किया करता है, दंभी है। वह कभी भी भ्रष्टाचारी बन सकता है।
प्रतिक्रिया से आपको बहुत सावधान रहना होगा। जिन इन्द्रियों को आपने कुछ महीने या वर्ष तक नियंत्रण में रखा है वे उपद्रवी बन सकती हैं, यदि आपमें सावधानी नहीं रही तो समय मिलने पर वे उपद्रव करके आपको घसीट लाती हैं। कुछ लोग एक या दो वर्ष तक ब्रह्मचर्य का अभ्यास कर लेने के बाद और भी अधिक कामुक शक्त कर अत्यधिक शक्ति को विनाष्ट कर डालते हैं।
योगिक विज्ञान के अनुसार वीर्य सूक्ष्म रूप से समस्त शरीर में व्याप्त है। कामुक इति तथा कामोत्तेजन द्वारा उसे स्त्रीचा तथा स्थूल रूप में परिणत किया जाता है। ऊर्ध्वरेता बनने के लिए उस स्थूल वीर्य को जो पहले से बन चुका है रोकना ही भर पर्याप्त नहीं है, वरन् उसके निर्माण कार्य को रोकना तथा शरीर प्रणाली में विलीन करना भी आवश्यक है। सच्चे ऊर्ध्वरेता मनुष्य के शरीर पक्ष के समान सुवासित होता है। जिसमें स्थूल वीर्य है वह बकरी के समान महँकता है। प्राणायाम के अभ्यास से वीर्य सूख जाता है। वीर्य शक्ति मस्तिष्क को उज्जीवित करता है। यह ओजस्व शक्ति के रूप में स्पंदित होती है तथा अमृत के रूप में निकलती है।
उन योगियों की जै हो जो ऊर्ध्वरेता बन चुके हैं, तथा जो स्वरूप में निवास कर रहे हैं। हम सभी शम, दम, विवेक, विचार, चैराग्य, प्राणायाम, अप, ध्यान के अभ्यास से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। हमारे हृदयों का अन्त-