ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऊर्द्धवरेता योगी
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जो प्राण को नियंत्रित करता है वह मन तथा वीर्य की गति को भी नियंत्रित कर लेता है । यदि शुद्ध विचार, सर्वांगमान, शोषासन तथा प्राणायाम के अभ्यास से वीर्य को नियंत्रित कर उसे मस्तिष्क की ओर ऊर्द्ध प्रवाहित किया गया तो मन तथा प्राण स्वतः निरुद्ध हो जायेंगे ।
जिसने मन पर विजय पाली उसने प्राण को भी वर्शा-भूत कर लिया । मन इन दो वस्तुओं—प्राण स्पंदन तथा वासन के द्वारा गतिशील बनता है । यदि इनमें से किसी एक को भी मार दिया गया तो दूसरा स्वतः मर जाता है । जहां मन को लीन किया जाता है वहीं प्राण भी निरुद्ध होता है, तथा जहां प्राण को स्थिर किया जाता है वहां मन लीन हो जाता है । मन तथा प्राण मनुष्य तथा उसकी छाया के समान निकट संबंध रखते हैं । यदि मन तथा प्राण नियंत्रित न किये तो सारे इन्द्रिय—हानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय अपने व्यापारों में संलग्न रह गये ।
वह अखण्ड ब्रह्मचारी जिसने बारह वर्षों तक वीर्य की एक बूंद भी गिरने न दिया है, बिना प्रयास के ही समाधि में प्रवेश करेगा । प्राण तथा मन उसके पूर्ण नियंत्रण में हैं । बालब्रह्मचर्य तथा अखण्ड ब्रह्मचर्य पर्यायवाची हैं । अखण्डब्रह्मचारी की धारणाशक्ति, स्मृतिशक्ति तथा विचारशक्ति प्रबल होती है । अखण्डब्रह्मचारी को मनन तथा निदिध्यासन की भी आवश्यकता नहीं है । यदि एक बार भी वह महावाक्य का अवगण कर लेगा तो शीघ्र ही वह आत्मसाक्षात्कार या ब्रह्मानुभव प्राप्त कर लेगा । उसकी बुद्धि शुद्ध तथा उसकी समझ अत्यन्त ही स्पष्ट है । आप अखण्ड ब्रह्मचारी बन सकते हैं, यदि आप सच्चा प्रयास करें । केवल जरा रखने, कपाल तथा शरीर में चार लगाने से कोई