ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
३. जानवरों तथा पशुओं के मैथुन को न देखिये ।
४. अधिक साङ्किल न चलाइये ।
५. विलास एवं आराम का प्रेमी न बनिये । आलस्य को दूरकर सदा किसी न किसी उपयोगी काम में लगे रहिये । आपका मन सदा संलग्न रहे—आध्यात्मिक साहित्य के अध्ययन तथा अन्य शुभ कर्मों में । आलस्य में समय न गंवाइये ।
६. त्रिम कार्य को आप करें वह आपके आनन्द का स्रोत हो । आप अपने काम में सुख का अनुभव कीजिये । उसे आप भार के रूप में न कीजिये । जब मन किसी कार्य को भार समझता है तो तब वह किसी अन्य वस्तु से सुख प्राप्त करना चाहता है । सदा सुख पूर्वक अनायास काम करते रहिये जिससे मन को पाप-कृत्यों की ओर जाने का मौका भी न मिले । ईश्वर के लिये काम कीजिये । तब सभी कार्य सुखप्रद हो जायेंगे । शारीरिक श्रम का कार्य भी कीजिये । परन्तु अपने को थका न डालिये । कर्म को अपनी लीला बना डालिये । तब आप विना किसी चिन्ता तथा शोक के काम करते रहेंगे ।
७. आसन कीजिये । (शीर्षासन, सर्वांगासन तथा मिडामन ) गहरी स्वास ले लीजिये भक्ति का प्राणायाम का अभ्यास कीजिये । मीलों तक दहलिये । खेल में भाग लीजिये ।
८. सदा टेंडे जल के द्वारा स्नान कीजिये । मंत्र तथा पैशन की वस्तुओं का प्रयोग न कीजिये । नृत्य तथा संगीत-पार्टियों में भाग न लीजिये । गाना न गाइये आप कीर्तन में भाग ले सकते हैं । परन्तु अपनी संगीत-कला का प्रदर्शन न कीजिये ।