भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 200

१८६

ब्रह्मचर्ये साधना

फरता है—बाहर से तो मुस्कराता है परन्तु अन्तः क्रोध की आग घघकती है। वह अपने अन्तःकरण मारता है। अपनी बुद्धि का दमन करता है। तब भ्रमित होकर इस संसार में विचरण करता है तथा अगुरे कार्यों के फल स्वरूप वह भगन्दर आदि रोगों शिकार हो जाता है। तकलीफ होने पर वह रोता है—“मैं महान्, पापी हूँ! मैं इस दुःख को सहन नहीं सकता। मैंने अपने पूर्व जन्म में बहुत से पाप किये हैं हे प्रभु! क्षमा कर, रक्षा कर।” परन्तु इसी जन्म में अपन भाग्य बदने के लिए वह रंजमात्र भी पुरुषार्थ करत नहीं चाहता।

कैशनबल लोगों के वस्त्रों से छुट्टे हुए कपड़े के टुकड़ों से, सारी दुनियाँ को ढँका जा सकता है। फैशन में अत्यधिक धन का अपव्यय होता है। मनुष्य को इस जगत में बहुत ही कम वस्त्र की आवश्यकता है। एक जोड़ा साधारण वस्त्र, चार रोटी तथा एक लोटा पानी। यदि फैशन के रूप्यों को सत्कर्मों में लगाया जाय—दान, समाज सेवा, आदि—तो निश्चय ही मनुष्य दिव्य बन जायगा। वह नित्य शांति तथा सुख का भोग करेगा। परन्तु आप कैशनबल लोगों में क्या देखते हैं? अशांति, दुःख, भय, निराशा, तथा पीला चेहरा। वे रेशमीकपड़े, तथा अपट्टुडेड पोशाकों में हो सकते हैं परन्तु उनके चेहरों में प्रसन्नता नहीं, कुरूपता है। शोक, लोभ, काम, तथा धृष्टा के क्रीदों ने उनके हृदयों को जर्जर बना डाला है।

यदि इंगलैण्ड के बैरन (जमींदार) को अपने भूट तथा हैट को उतारने के लिए कहिये, जिस समय वह हिंदू मन्दिर में प्रवेश कर रहा हो, तो वह अनुभव करता है