ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
सहायता प्रदान करेगा। काम पर आक्रमण करने के लिए वह एक अमोघ शस्त्र है। यदि आप ब्रह्मचर्य व्रत धारण नहीं करते हैं तो आपका मन किसी भी समय लालायित हो सकता है। उस प्रलोभन को दवाने के लिए आपके पास कोई भी शक्ति नहीं होगी और आप अवश्य उसका शिकार बन जायेंगे। जो मनुष्य अशक्त और स्त्री स्वभाव का है, वह इस व्रत को ग्रहण करने से डरता है वह इसके लिए कई बहाने प्रस्तुत करता है और कहता है “मैं संकल्प के द्वारा क्यों अपने को बन्धन में डालूँ। मेरी इच्छा-शक्ति बलवान और समर्थ है। मैं किसी भी प्रकार प्रलोभन को दबा सकता हूँ। मैं भक्ति करता हूँ। मैं इच्छाशक्ति की बढ़ाने का अभ्यास करता हूँ।” उसको आगे जाकर पछुताना पड़ता है। उसका इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता। जिस मनुष्य के अन्तःकरण में त्याज्य पदार्थ की सूक्ष्म वासना बनी रहती है, केवल वही मनुष्य इस प्रकार के बहाने प्रस्तुत (पेश) करता है। आपका विचार, विवेक और वैराग्य उचित या सही होना चाहिए। केवल तब ही आपका त्याग नित्य और स्थिर हो सकता है। यदि त्याग विवेक और विचार के द्वारा नहीं किया गया है, तो मन केवल उस वस्तु को पुनः प्राप्त करने का अवसर हूँदता रहेगा जिसका कि उसने त्याग किया है।
यदि आप अशक्त या दुर्बल हैं तो पहिले एक महीने के लिए ब्रह्मचर्यव्रत धारण कीजिए पुनः उसको तीन महीने के लिए बढ़ाइए। आप कुछ बल प्राप्त कर लेंगे; आप उसी व्रत को ६ महीने के लिए बढ़ा सकेंगे। इस प्रकार शनैः शनैः आप इसी व्रत को एक दो या तीन वर्षों तक