ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य व्रत
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कहना है कि शारीरिक और मानसिक बल की वृद्धि तथा बुद्धि की तीव्रता के लिए वीर्य की रक्षा करना आवश्यक है।
एक दूसरे लेखक डान्टर ६० पी० मित्रा लिखते हैं “वीर्य, चाहे जाने वा अनजाने यदि नष्ट किया जाता है, तो यह सान्तात् जीवन-शक्ति का ही हास है।”
यह सर्वत्र स्वीकार किया गया है कि रक्त के उत्तमोत्तम तत्व के द्वारा ही वीर्य का निर्माण होता है। यदि ये उप-युक्त सिद्धांत सही हैं तो यह कहा जा सकता है कि मनुष्य की भलाई व उन्नति के लिए पवित्र जीवन परमावश्यक है।
वीर्य की रक्षा के लिए नित्य कौपीन (लंगोट) पहिनना आवश्यक है; इससे श्रंङकोष की वृद्धि तथा रात्रि में प्रवाह (स्वप्नदोष आदि द्वारा) नहीं होगा। ब्रह्मचारी के लिए यह योग्य है कि वह नित्य खड़ाऊं पढ़ने, क्योंकि इससे वीर्य की रक्षा होगी, नेत्रों को लाभ होगा, आगु दीर्घ होगी तथा शरीर की पवित्रता और कांति बढ़ेगी।
जब वीर्य एक बार नष्ट हो जाता है तो पुनः उसकी पूर्ति आप जन्म भर में भी नहीं कर सकते, चाहे आप कितने ही वादम, दूध, मक्खन, च्यवनप्राश या मकरध्वज आदि पौष्टिक श्रोपथियों का सेवन करें। यह वीर्य जब सावधानी के साथ रक्षित किया जाता है, तो वह एक विचित्र कुजी का काम देता है कि जिसके द्वारा आप आत्मा-परमात्मा या नित्यानन्द के राज्य-द्वारों को खोल सकते हैं तथा जीवन में सब प्रकार की उन्नति क्रियाओं में मगलता प्राप्त कर सकते हैं।
ब्रह्मचर्य-व्रत
ब्रह्मचर्य वा व्रत आपको प्रलोभनों से बचने के लिए