ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
वीर्य का वह भाग जिससे हृदय और शरीर की पुष्टि होती है, वह निकल जायगा। (परन्तु एक पूर्ण योगी जो निरन्तर ध्यान में मग्न रहता है, वह पूर्ण ब्रह्मचर्य प्राप्त करेगा यदि वह शारीरिक व्यायाम न भी करे)।
बुद्ध प्रृथ्वी से रस प्राप्त करता है। वह रस उस बुद्ध की टहनियाँ, शाखायें, पत्तियाँ, फूल, फल आदि में सर्वत्र व्याप्त हो जाता है। फलों, पत्तियों आदि में जो सुन्दरता और चमक दमक है उसका कारण वह रस ही है। ठीक उसी प्रकार वीर्य जो अंडकोंपों के सूक्ष्म भागों के द्वारा रक्त से बनता है वह (वीर्य) ही शरीर और उसकी अन्य इन्द्रियों को सुन्दरता और बल प्रदान करता है।
भगवान् धन्वन्तरि के शिष्यों में से एक शिष्य ने अपनी आयुर्वेद की शिक्षा समाप्त कर लेने के पश्चात् उनसे कहा, “हे भगवन् अब आप मुझे कुण्डलन कर स्वास्थ्य का रहस्य बतलाइये।” भगवान् धन्वन्तरि ने जवाब दिया “यह वीर्य ही आत्मा है।” इस सारभूत शक्ति की रक्षा करने में ही स्वास्थ्य का रहस्य प्रस्तुत है। जो मनुष्य इस शक्ति को नष्ट करता है, वह शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक किसी प्रकार भी उन्नति प्राप्त नहीं कर सकता।
यदि वीर्य मनुष्य में निरन्तर अद्भूत है, तो वह या तो बाहिर निकल जाना चाहिए या पुनः सूख जाना चाहिये। वैज्ञानिक अनुसन्धान (खोज) के द्वारा यह सिद्ध हुआ है कि धातु जब एकत्रित किया जाकर पुनः शरीर में सुखाया जाता है तो वह रक्त को शुद्ध व सुशोभित कर मस्तिष्क को बल प्रदान करता है। डायर लुई का