ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवीथ
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के सूक्ष्म-भाग रक्त की एक-एक बूँद के द्वारा वीर्य को एकत्रित करते हैं। तब यह स्नाव दो नाड़ियों के द्वारा शुक्र संबंधी स्थान को ले जाया जाता है। उच्चेजना या प्रकोप की अवस्था में वह विशिष्ट नाड़ियों के द्वारा मूत्र-नली में फँक दिया जाता है जहाँ वह शिश्न संबंधी स्नाव के साथ मिल जाता है। (इस विषय में विशेष जानकारी के लिए किसी शरीर रचना संबंधी शास्त्र का अवलोकन कीजिए) इस ज्ञान की आवश्यकता है। अब मैं परमावश्यक विभाग साधना की ओर चलता हूँ जिसमें वीर्य रक्षण के आभ्यासिक तरीके बताये गये हैं।
आयुर्वेद के अनुसार वीर्य सातवीं यानी आखिरी धातु है जो मज्जा से बनता है। इन सात धातुओं का निश्चित वर्णन ऊपर कर दिया गया है। प्रत्येक धातु के तीन भाग होते हैं। वीर्य स्थूल शरीर की, हृदय तथा बुद्धि की पुष्टि करता है। जो मनुष्य स्थूल शरीर, हृदय और बुद्धि तीनों का सदुपयोग करता है केवल वही पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य पालन कर सकता है। एक पहलवान या कुश्ती करने वाला जो केवल अपने स्थूल शरीर ही को पुष्ट रखता है परन्तु अपनी बुद्धि और हृदय को उन्नत नहीं करता वह पूर्ण ब्रह्मचर्य कदापि नहीं रख सकता। वह केवल शारीरिक ब्रह्मचर्य ही रख सकता है न कि मानसिक और हार्दिक। वह धातु जिसका सम्बन्ध हृदय और मन से है नितन्देह वह जायगा। यदि कोई साधक केवल जप और ध्यान करता है और यदि वह अपने हृदय को उन्नत नहीं बनाता और यदि वह शारीरिक व्यायाम नहीं करता तो वह केवल मानसिक ब्रह्मचर्य ही प्राप्त कर सकेगा।