भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

के सब सूक्ष्म भागों में पाया जाता है। अन्न से रस बन है। रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से चरबी, चर से हड्डी और हड्डी से मज्जा और मज्जा से वीर्य उत् होता है। ये ही सात धातु इस शरीर और जीवन आधार हैं। गौर कीजिये कि वीर्य कितना कीमती है। वह अन्तिम सार है। वह सभी सारों का सार है। रक्त की ४ बूँदों से वीर्य की एक बूँद बनती है।

आयुर्वेद के अनुसार रक्त की ८० बूँदों से वीर्य व एक बूँद बनती है, ऐसा माना गया है। जिस प्रकार ईश्वर में रस और दूध में मक्खन सर्वत्र व्यापक रहता है ठीक उसी प्रकार सब शरीर में वीर्य व्यापक रहता है। जिस प्रकार दूध से मध्य कर मक्खन निकाल लेने के बाद पतली छाछ रह जाती है, ठीक उसी प्रकार वीर्य क्षय होने से वह पतला पड़ जाता है। जितना अधिक वीर्य का क्षय होगा उतना ही अधिक मनुष्य अशक्त होगा। योग शास्त्रों में कहा है “मरणम् त्रितु पातेन जीवनम् त्रितु रक्ष्यात्।” अर्थात् त्रितु (वीर्य) के पतन से मृत्यु और उसके रक्षण से जीवन प्राप्त होता है वीर्य ही मनुष्य में वास्तविक सार-भूत शक्ति है। वह मनुष्य के लिए गुप्त निधि है। वह मुख पर कांति (ब्रह्मतेज) और बुद्धि में तीव्रता प्रदान करता है।

अंडकोष की शैली में जो दो अंडकोष रहते हैं, उनको स्नाय या रस-ग्रन्थियां कहते हैं। इन अंडकोषों में एक विशिष्ट पदार्थ रहता है जो रक्त से वीर्य उत्पन्न करता रहता है। जिस प्रकार मधु-मन्त्रियां बूँद बूँद करके छुने में मधु एकत्रित करती हैं, ठीक उसी प्रकार इन अंडकोषों