ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवीर्य
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जो मनुष्य उपर्युक्त आठ प्रकार की वाधाओं से मुक्त है केवल वही सच्चा ब्रह्मचारी कहा जा सकता है। सच्चे ब्रह्मचारी को चाहिये कि वह इन वाधाओं से सर्वथा बचा रहे।
मनु महाराज का कथन है कि जब तक विद्यार्थी पाठशाला में अध्ययन करते हैं, तब तक उनको चाहिये कि वे अपनी इन्द्रियों पर पूरा पूरा नियंत्रण रखने का अभ्यास करें। उनको चाहिए कि वे मदिरा, मांस, सुगन्धित तैल या द्रव, फूल मालाएँ, व्री, गर्भ और तीक्ष्ण पदार्थ, अंजन, जूते, छाता, जूआ, गपशष्प, मिथ्या भाषण, स्त्रियों की ओर देखना, धनकम धनका करना और अन्यो के साथ शयन करना आदि आदि बातों से सदा बचे रहें। विद्यार्थी को स्वप्न में भी अपने वीर्य को नष्ट नहीं होने देना चाहिये। यदि वह जाने या अनजाने किसी भी प्रकार से वीर्य नष्ट करता है तो वह अपने कर्तव्य से न्युत होता है। यह उसकी मृत्यु है। यह पाप है। वह एक पतित व्यक्ति है। उसे चाहिये कि वह उचित साधना के द्वारा अपने वीर्य की रक्षा करे। केवल ब्रह्मचर्य और ब्रह्मचर्य के ही द्वारा आप जीवन में शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकते हैं।
वीर्य
अस से रस, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से चरवी, चरवी से हड्डी, हड्डी से मज्जा, और अन्त में मज्जा से शुक्र या वीर्य बनता है।
जो गुदा (मज्जा) हड्डियों के भीतर कुम्भ द्वारा रहता है, उससे वीर्य उत्पन्न होता है। वह सूक्ष्म स्थिति में शरीर