ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
प्रत्येक मनुष्य को चाहिये कि वह अपने चरित्र को सुधारने का भरसक प्रयत्न करे। आपका सारा जीवन तथा जीवन में सफलता केवल आपके चरित्र निर्माण पर ही भरसक निर्भर है। संसार में सभी महापुरुषों ने जो प्रभुता प्राप्त की है वह केवल अपने चरित्र के ही द्वारा की है। संसार के प्रसिद्ध बुद्धिमान पुरुषों ने जो कर्त्तव्ययाति और मान प्राप्त किया है, वह केवल उनके चरित्र के ही द्वारा हुआ है।
ब्रह्मचर्य के अष्ट अंग
ब्रह्मचर्य के निम्नलिखित आठ अंग हैं। तदनुसार अष्ट ब्रह्मचर्य की धारा में आठ अवरोध (विघ्न)। आपको इन विघ्नों से पूर्ण विचार, पूर्ण पुरुषाध ॐ पूर्ण सावधानी के साथ बचना चाहिये।
(१) दुर्शन—किसी स्त्री या स्त्री के चित्र (फोटो) को कामातुर हृदि से देखना।
(२) स्पर्शन—स्त्री के पास बैठने, उसको छूने या उस को गले लगाने की इच्छा।
(३) केली—स्त्री के साथ खेलना।
(४) कीर्तन—स्त्री के गुणों की अपने मित्रों के सामने प्रशंसा करना।
(५) गुह्य भाषण—स्त्री के साथ एकांत में बातचीत करना।
(६) संकल्प—स्त्री का चिंतन करना।
(७) अध्यवसायम्—स्त्री के साथ विषय-भोग करने का हृदय संकल्प।
(८) क्रिया—स्त्री प्रसंग।