भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य क्या है ।

काय-सिद्धि प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्य एक आधार है । पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये । यह परम आवश्यक है । योग के अभ्यास से वीर्य श्रोत्र शक्ति में बदल जाता है । योगी का शरीर पूर्ण स्वस्थ होगा । उसकी चाल में आकर्षण और अनुग्रह होगा । वह (इच्छा मृत्यु) जब तक चाहे उतने ही वर्षों तक जीवित रह सकता है । यही कारण है कि भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं “तस्मात् योगो भवार्जुन” —अर्थात् हे अर्जुन तू योगी बन ।

मैथुन संबंधी विचारों और भावनाओं से मुक्त रहना ही ब्रह्मचर्य है । ब्रह्मचर्य मन, वचन और कर्म से इन्द्रिय-निग्रह है । यह पुरुषों और स्त्रियों दोनों के लिये समान रूप से आवश्यक है । भीष्म, हनुमान, लक्ष्मण, मीरा-वार्हा, सुलभा, और गार्गी—ये सब ब्रह्मचारी थे । भगवान् शंकर ने कहा है—“ब्रह्मचर्य सब से उत्तम तप है; ऐसा पूर्ण पवित्र ब्रह्मचारी वास्तव में ईश्वर है ।”

ब्रह्मचर्य अमरत्व प्राप्त करने के लिये मूल आधार है । ब्रह्मचर्य से आधिभौतिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है । ब्रह्मचर्य शरीर के भीतर रहने वाले काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रुओं के साथ युद्ध करने के लिये एक प्रमोष शस्त्र है । यह विशिष्ट आनन्द, अस्वंड और नित्य सुख का देने वाला है । वह आर्यभिक वल, शुद्ध मस्तिष्क, विशालबुद्धि और इच्छाशक्ति, धारणा-शक्ति और उत्तम विचारशक्ति प्रदान करता है । केवल ब्रह्मचर्य के द्वारा ही आप शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकते हैं ।