भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

ब्रह्मचर्य साधना

दन्दिद्वयों को भी । निर्वाण पद का द्वार पूर्णब्रह्मचर्य है परमानन्द के राज्य-द्वार को खोलने के लिए पूर्ण (शुद्ध) ब्रह्मचर्य एकमात्र कुंजी है । परम शान्ति रूपी धाम क मार्ग ब्रह्मचर्य या पवित्रता से ही आरम्भ होता है ।

सांसारिक पदार्थों की इच्छा पूर्ति ही पाप है । स्थूल शरीर तो अलौकिक पदार्थों के विषय में निरन्तर चिंतन करने वाली आध्यात्मिक भावना का एक तुच्छ गुलाम है । मनुष्य की उत्पत्ति इस लिये हुई थी कि वह ब्रह्म या ईश्वर के साथ आध्यात्मिक सम्पर्क रखते हुये जीवन-यापन करे, परन्तु वह उन दुष्ट अशुभों के प्रलोभनों के अधीन हो गया जिन्होंने उसको उसके विषय-सुख वाले स्वभाव की ओर प्रवृत्त कर उसे भगवत् चिंतन से दूर कर दिया तथा उसको सांसारिक जीवन यापन करने में जुटा दिया । इसलिये सब विषय सुखों के त्यागने, विवेक और वैराग्य के द्वारा अपने को संसार से दूर रखने, आत्मा के पीछे अकेला जीवन यापन करने तथा ईश्वर की पूर्णता और पवित्रता का अनुसरण करने में ही धर्मानुरूप भलाई है । ब्रह्मचर्य वसंत ऋतु का खिला हुआ पुष्प है जिसकी पंखुरियों में से अमरत्व निकलता है । धैर्य और वीरता के असाधारण गुण ब्रह्मचर्य रूपी पवित्रता के साथ घनिष्ठ संबंध रखते हैं । केवल छी मसंग (मैथुन) से बचे रहना ही पर्याप्त नहीं, परन्तु अनियंत्रित भावुकताओं हस्त और वंसे ही अन्य कार्य तथा सब प्रकार के विपरीत मैथुन-अभ्यासों से दूर रहना भी परमावश्यक है । वैसे ही प्रेम संबंधी चिन्ताओं तथा विषय भोग संबंधी वृथा चिंतन से सदा दूर रहना भी नितांत अनिवार्य है ।