भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य क्या है ?

कहा है “योगी जन ध्येय (जिसको वेद वेत्ताओं ने बताया है) को प्राप्त करने के लिये ब्रह्मचर्य का अभ्यास करते हैं।” यही बात कटोपनिषद् अध्याय १-२-१५ में मिलती है।

ईश्वर रस है। रस वीर्य है। रस या वीर्य प्राप्त कर के ही आप नित्यानन्द प्राप्त कर सकते हैं। ब्रह्मचर्य का अर्थ है—वीर्य पर अधिकार, वेदों का अध्ययन, और व्रत चिन्तन। जैसा कि महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा है—

कायेन मनसा वाचा सर्वावस्थातु सर्वदा ।

सर्वत्र मैथुन त्यागो ब्रह्मचर्य प्रचक्षते ॥

अर्थात् शरीर, मन और वचन से सब स्थानों और सब स्थितियों में मैथुन से सदा बचे रहना ब्रह्मचर्य है।

ब्रह्मचर्य दो प्रकार का कहा गया है—एक शारीरिक और दूसरा मानसिक। शरीर पर नियन्त्रण रखना शारीरिक ब्रह्मचर्य है। डुरे विचारों पर नियन्त्रण रखना मानसिक ब्रह्मचर्य है। मानसिक ब्रह्मचर्य में कोई भी डुरे विचार मन में प्रविष्ट नहीं होंगे। मानसिक ब्रह्मचर्य शारीरिक ब्रह्मचर्य से कुछ अधिक कठिन है, परन्तु सच्ची लगन और परिश्रम के द्वारा मानसिक ब्रह्मचर्य पर वास्तविक आधिपत्य स्थापित किया जा सकता है। आपको सदा मानसिक ब्रह्मचर्य की भावना अपने सामने रखनी चाहिये। तब आप उसका शीघ्र ही अनुभव करेंगे। इसमें तनिक भी रुन्देए नहीं है।

ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल जननेन्द्रिय को ही काबू में राना नहीं है, परन्तु मन, वचन और कर्म से सारो