ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
साथ तथा अपने निजी अनुभव द्वारा यह घोषणा करके कहता हूँ कि चरित्र ही शक्ति है और चरित्र ज्ञान से भी कई अधिक श्रेष्ठतर है।
‘यम’ राजयोग का पहला अंग है। वह है—अहिंसा (किसी प्रकार की हिंसा न करना), सत्य (सत्य बोलना), अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (अविवाहित पवित्र जीवन-यापन करना), और अपरिग्रह (किसी से कुछ न लेना)—इनमें ब्रह्मचर्य का महत्व सब से अधिक है। ज्ञानयोग में साधक के लिए साधना की नींव दम (आत्म-संयम) है। महाभारत (शान्ति पर्व) में आपको मिलेगा “धर्म की कई शाखायें हैं, परन्तु उन सब का आधार ‘दम’ है।” जो मनुष्य आधिभौतिक या आध्यात्मिक जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए ब्रह्मचर्य का विषय बड़े महत्व का है। बिना ब्रह्मचर्य के मनुष्य सांसारिक कार्यों या आध्यात्मिक अभ्यासों के लिए पूर्ण अयोग्य है।
ब्रह्मचर्य मन, वचन और कर्म से पवित्र (अविवाहित) रहने का व्रत है जिसके द्वारा मनुष्य ब्रह्म की प्राप्ति करता है। ब्रह्मचर्य एक दिव्य शब्द है। यह योग का तथ्य (सार) है। अविद्या के कारण हम इसे भूल गए हैं। यह उत्तम योग है जिसके लिए भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में बड़े जोर के साथ स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ध्यान के लिये ब्रह्मचर्य व्रत परम आवश्यक है—(अध्याय ६. श्लोक १४, अध्याय १७. श्लोक १४४ में)। भगवान् कृष्ण कहते हैं कि शारीरिक त्यों के लिये जो जो आवश्यक वस्तुयें हैं, उनमें ब्रह्मचर्य एक है। पुनः अध्याय ८. श्लोक ११. में