भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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आधुनिक शिक्षा

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करने की शुभेच्छा) आदि गुणों का पूर्ण विकास रहता था।

आजकल कालेजों के विद्यार्थियों में इन सदुगुणों में से एक भी सदुगुण नहीं मिलता। आत्म-संयम किस चिड़िया का नाम है, यह तो वे जानते ही नहीं। विलासी जीवन और आत्म अनुकूलता तो उनमें बचपन ही से प्रारम्भ हो जाता है। अभिमान, धृष्टता और आज्ञा-भंग आदि दुर्गुण तो उनमें कूट-कूट कर भरे रहते हैं। वे पक्के नास्तिक और उग्र अनात्मवादी हो गए हैं। बहुतों को तो यह कहने में लज्जा प्रतीत होती है कि वे ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं। ब्रह्मचर्य और आत्म-संयम का उनको तनिक भी ज्ञान नहीं है। सुन्दर आकर्षण पोशाक, अभ्रमच-भोजन, कुसंगति, नाटक सिनेमा देखना, तथा पाश्चात्य रहन सहन के कारण वे दुर्बल और कौधी हो गए हैं। ब्रह्मविद्या, आत्म-ज्ञान, आध्यात्मिक विद्या, वैराग्य, मोक्ष बन्धन, आत्मा की शांति तथा उसके आनंद से वे नितांत अनभिज्ञ हैं। चालढाल, लोकव्यवहार, विप्यासक्ति, लोलुपता तथा विलासिता ने उनके भीतर घर कर लिया है। कालेज के कुछ एक विद्यार्थियों की जीवन-कहानी यदि आप सुनें तो आपको अत्यन्त कष्ट उत्पन्न होगी। गुरुकुल में छात्र-गण आरोग्य, बलवान और दीर्घजीवी होते थे। बंगाल के स्वास्थ्य विभाग अधिकारियों की विज्ञति के अनुसार कलकत्ता और ढाका में ७५ फी सदी विद्यार्थी अस्वस्थ हैं तथा कर्बई स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की विज्ञति के अनुसार करांची में ६० फी सदी विद्यार्थी अस्वस्थ है। वास्तव में यह भी अनुसन्धान किया गया है कि समस्त भारतवर्ष में विद्यार्थियों का स्वास्थ्य