ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
अशिष्ट (अष्ट) व शोचनीय है। इसके अतिरिक्त जिन दुष्ट-मनों व दुष्टवहारों के कारण उनके स्वास्थ्य का हान हो रहा है, वे दिनों दिन बढ़ रहे हैं। आजकल की स्कूलों और कालेजों में मदाचार की तथा धर्म की शिक्षा नहीं दी जाती। अर्वाचीन सभ्यता ने हमारे बालक बालिकाओं को बिलकुल अशक्त बना दिया है। वे क्रमिम (बनावटी) जीवन यापन करते हैं। बच्चों के बच्चे उत्पन्न होते हैं। यह कुल मर्यादा की अष्टा है। सिनेमा निदास्पद हो गया है। वह भावुकता तथा कामोत्पत्ति का प्रेरक है। आजकल सिनेमाओं में, रामायण और महाभारत की कहानियों के रहते हुए भी अधिकतर असभ्य दृश्य तथा अशिष्ट खेलों का ही प्रदर्शन किया जाता है। सुभे पुनः यहां जोर देकर कहना पड़ता है कि भारतवर्ष में जो आजकल शिक्षा प्रणाली प्रचलित है उसमें पूर्णतया तीव्र परिवर्तन करने की तत्काल आवश्यकता है। कहीं कहीं कालेजों में प्रोफेसर लोग अपने विद्यार्थियों को फेसनेबल (सानदार) बल्ल पहिनने के लिए वाध्य करते हैं। इतना ही नहीं वे उन विद्यार्थियों से पूछा करते हैं जो स्वच्छ व सादे बल्ल पहिनते हैं। कैसी करुणास्पद अवस्था है ! स्वच्छता एक वस्तु है और फेसन एक अन्य ! इस प्रकार की फेसन सांसारिक जीवन तथा इन्द्रिय-मुख भोगों में जड़ पकड़ लेती है।
अध्यापकों तथा माता पिताओं के कर्तव्य विद्यार्थियों के मदाचार तथा उनके वस्तुतः चरित्र-निर्माण कार्य में, अध्यापकों और प्रोफेसर्स का बड़ा भारी उत्तरदायित्व है। उनको स्वयं पूर्ण मदाचारी और पवित्र