भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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अध्यापक तथा माता पिताओं क कर्तव्य

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होना चाहिए। उन्हें धार्मिक होने चाहिये। अन्यथा वह ठीक वैसा ही होगा जैसा कहा है—“अंधे की लकड़ी, को अंधे ने ही पकड़ी” अर्थात् अंधा मनुष्य ही अन्य अंधे मनुष्य को राह बताता है। प्रत्येक अध्यापक को चाहिए कि वह अपने अधिकार के महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व का पूर्णरूप से अनुभव करे। केवल युक्त भाषण-कला में मानसिक निपुणता प्राप्त कर लेना ही अध्यापक का वास्तविक शृंगार नहीं है। जब विद्यार्थी युवा अवस्था को प्राप्त होते हैं तो उनके स्थूल शरीरों में कुछ वृद्धि और परिवर्तन होने लगते हैं आवाज बदल जाती है। मन में नये भाव व विचार उत्पन्न होने लगते हैं। वे स्वभावतया विकल्क्षण (जिज्ञासु) बन जाते हैं। वे गलियों में अपने मित्रों से सलाह करते हैं। उन्हें कुत्सित सलाह मिलती है। वे दुर्ग्यसनों के कारण अपने स्वास्थ्य को नष्ट करते हैं। लिंग संबंधी स्वास्थ्य, आरोग्य शास्त्र, ब्रह्मचर्य, दीर्घायु तथा क्रोध व भावुकता पर विजय प्राप्त करने की विधि, आदि आदि विषयों का उन्हें पूरा पूरा ज्ञान प्राप्त कराया जाना चाहिए।

माता पिताओं को चाहिए कि वे अपने बच्चों को महाभारत और रामायण की कहानियां सुनावें। जो ब्रह्मचर्य और सदाचार से संबंध रखती हैं।

माता पिताओं को चाहिए कि वे अपने बच्चों को वारंवार ब्रह्मचर्य के विषय में शिक्षा देते रहें। यह उनका एक विशिष्ट कर्तव्य है। जब बालक और बालिकाओं में तपस्वावस्था के लक्षण दीखने लगे, तो उन्हें सब बातें दूर रूप से कह देना आवश्यक है। धीरे धीरे बताने में