भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 85

७०

ब्रह्मचर्य साधना

और र्खाचिता है। जिह्वा मन को काफी की बुकानों की ओर भगा कर ले जाती है। मन के लिए एक सूख भी विश्राम नहीं है? चित्ता, शोक, आकुलता, भय, व्याधियां, दुर्बल्य, घृणा, काम, कोष, आदि मन के भीतर हल चल मचाते रहते हैं तथा उसको निरन्तर संतप्त करते रहते हैं। जिसने अपने विचार, भावनायें, चित्त-वृत्तियां, प्रेरणायें तथा अपनी इन्द्रियों पर आधिपत्य प्राप्त किया है वह वास्तव में सम्राटों का सम्राट् है। वह धन्य है। ब्रह्मचर्य के पूर्णतया रक्षण के लिये सब इन्द्रियों पर सर्वथा आधिपत्य प्राप्त करना नितान्त आवश्यक है।

प्रतिक्रिया के संबंध में आपको अत्यन्त सावधान रहना पड़ेगा। जिन इन्द्रियों को आपने महीनों और वर्षों पर्यन्त वश में रखा है वे ही इन्द्रियां तनिक ही असावधानी के कारण उपद्रवी हो सकती हैं। अबसर प्राप्त होते ही वे आप पर बलात् आक्रमण करेंगी। कुछ लोग जो एक या दी-वर्षों तक ब्रह्मचर्य का अभ्यास करते हैं वे ही अनन्तर अधिक कामी होकर अपनी वीर्य शक्ति का अधिक नाश करते हैं। अन्त में वे असाध्य दुराचार भी बन जाते हैं।

यह के एक भूत पर नियन्त्रण रखना कितना कठिन है। शरीर की एक इन्द्रिय को अपने आधीन रखना कितना अधिक कठिन है। पुनः यदि पांचों इन्द्रियों को एक साथ वश में रखना है, तो आप समझ सकते हैं कि वह और भी कितना अधिक कठिन होगा। वह योगी जो जितेन्द्रिय है वह इस संसार में एक प्रभान शास्त्री महाराजा ॥