भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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मन, प्राण और वीर्य

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जीवन एक बहुत बड़ी सरिता है। इन्द्रियां उसमें पानी हैं। काम, क्रोध और लोभ रूपी उसमें बड़े बड़े मगर-मच्छ आदि जलचर हैं। जन्म और मरण रूपी दो भँवर हैं। ज्ञानी मनुष्य आत्म संयम और विचार रूपी नौका के द्वारा इस सरिता को पार करता है।

भूम शब्देन्द्रिय की प्रबलता के कारण जाल में फँस कर अपने प्राण गँवा देता है; इसी प्रकार हाथी, पतंग, मछली, तथा भ्रमर क्रमशः स्पर्श, रूप, रस तथा प्राणोन्द्रिय की प्रबलता के कारण अपने प्राणों को समाप्त कर देते हैं। जब एक ही इन्द्रिय की प्रबलता ऐसी है तो फिर मनुष्य की पंचेन्द्रियों के युक्त प्रभाव की प्रबलता किस प्रकार की होगी, उसे पाठक स्वयं समझ सकते हैं।

जिस प्रकार खनिज पदार्थों की अशुद्धता धौकनी के द्वारा जलाकर भस्म कर दी जाती है, ठीक उसी प्रकार इन्द्रियों के कलंक भी प्राणों के निरोध के द्वारा दग्ध किये जाते हैं। अतः प्राणायाम का नियम अभ्यास करना चाहिये। वह अत्यन्त परिसोधक है।

सामान्य मनुष्यों को मन पर अधिकार नहीं होता। मन इधर उधर भागता रहता है। वह विध्वंस करता है। वह मनुष्य पर अधिकार जमाता है। वह नियं हल चल और कलह की स्थिति में रहता है। उसमें भावनायें और प्रवृत्तियां उठती रहती हैं। वह इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण किये इच्छित पदार्थों के चित्रों से हर समय प्रभावित होता रहता है। प्रत्येक इन्द्रिय, अपनी वृत्ति के लिये मन को अपने विशेष भोग-पदार्थ की ओर खींचती रहती है। कर्ण जब कभी मीठी तान को सुन पाता है तो मन को अपनी