ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य
है। मन चेष्टा करता है और पंच-ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा इस संसार के अनुभवों को ग्रहण करता है। वह ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा ही आनन्द को प्राप्त करता है। वह कर्मेन्द्रियों से दृष्टपूर्वक काम करवाता है। अतः इन्द्रियों को वश में करना वास्तव में मन ही को वश में करना है। यम, नियम, शम, दम, प्रत्याहार आदि के अभ्यास का उद्देश्य मन और इन्द्रियों को वश में करना ही है।
मन पंच ज्ञानेन्द्रियों के सहयोग से शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध के द्वारा आनन्द प्राप्त करता है। स्पर्श के द्वारा वह उत्तम आनन्द का अनुभव करता है। मैथुन का सुख ही मन के लिए एक विशिष्ट (सब से उत्तम) सुख है। प्रत्येक मनुष्य उसी सुख के पीछे दौड़ता है और उसी में समाप्त हो जाता है। अब रस (उत्तम खान पान) को लीजिए। रूप, आकार और सुन्दरता का सुख है। शब्द, वाद्य से प्राप्त होने वाला सुख है। अन्त में गंध को लीजिए। गंध की इन्द्रिय इतनी दुखदाई नहीं है जितनी रस की। यदि स्वादेन्द्रिय या जिह्वा वश में हो जाती है तो अन्य सब इन्द्रियां स्वयं वश में हो जाती हैं।
जिसने मन को वश में कर लिया उसने प्राण को भी वश में कर लिया। मन दो रूपों से कार्यनिमित्त होता है प्राण और वासनाओं के स्पन्दन से। यदि इन दोनों में से एक नष्ट हो जाय तो दूसरी वस्तु आप ही नष्ट हो जाती है। जब मन स्थिर होता है तो प्राण भी स्थिर हो जाता है। जब प्राण स्थिर होता है तो मन भी स्थिर होता है। जब मन और प्राण स्थिर नहीं होते तो सब इन्द्रियां चंचलता पूर्वक अपने अपने कार्यों में निमग्न रहती हैं।