ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य साधना
प्रति आकर्षण व आसक्ति नहीं होगी। शम और दम साधक के लिए सर्वश्रेष्ठ साधन हैं।
जिस प्रकार चीजों में पुष्प गुप्त रहते हैं, ठीक उसी प्रकार अन्तःकरण और कारण शरीर में वासनायें गुप्त रहती हैं। नित्य नये पुष्प खिलते हैं और पुनः एक या दो दिनों में वे सुरक्षा जाते हैं। ठीक इसी प्रकार वासनायें भी चित्त में एक के पीछे दूसरी उत्पन्न हो हो कर संकल्पों के द्वारा जीवों को अपने इच्छित पदार्थों को प्राप्त करने तथा उनका उपभोग करने के लिये निरन्तर उत्तेजित करती रहती हैं। वासनाओं से कार्य उत्पन्न होते हैं और कार्यों से पुनः वासनाओं को बल प्राप्त होता है। यह एक चक्रिका भी है। आत्म ज्ञान के उदय होते ही सब वासनायें सर्वथा दग्ध हो जाती हैं।
नाट्यशालाओं में जाने तथा चल-चित्रों के देखने की इच्छा एक प्रकार की अशुभ वासना है। गीता के अध्ययन तथा आध्यात्मिक साधनाभ्यास की इच्छा शुभ वासना है। शुभ वासनाओं की वृद्धि कीजिये। अशुभ वासनायें सारी आप ही नष्ट हो जायेंगी। आत्म साक्षात्कार की तीव्र इच्छा के द्वारा सर्व प्रकार की वासनायें नष्ट हो जायेंगी। शुद्ध वासनाओं की वृद्धि करने में कोई हानि नहीं है। आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में वे आपके लिए एक बहुमूल्य पूँजी हैं।
जब कभी आपके मन में कोई इच्छा उत्पन्न हो तो आप सदा अपने विवेक या विचार शक्ति से सम्मति प्राप्त करें। इस विवेक के द्वारा आप तुरत जान सकेंगे कि यह इच्छा दुःख पूर्ण है और वह एक निरर्थक प्रलोभन के