ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवैराग्य
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देखा है तो आप अपने हृदय में परखीगमन द्वारा व्यभि- चार कर चुके हैं।’ यद्यपि पहिले सात प्रकार के मैथुन से वीर्य की वास्तविक हानि नहीं होती तथापि वीर्य रक्त से पृथक हो जाता है और वह या तो निद्रा में या अन्य किसी भी रीति से अवसर प्राप्त होते ही बाहिर निकल आने का प्रयत्न करता है। पहले सात प्रकार के मैथुनों में मनुष्य मन से भोगों का उपभोग करता है।
यदि आप काम को वश में करना चाहते हैं तो जिह्वा को वश में करना आवश्यक है। प्रथम जिह्वा को वश में कीजिये; पुनः काम को वश में करना सरल हो जायगा। स्वादिष्ट राजसिक भोजन से जननेन्द्रिय को उत्तेजना प्राप्त होती है। इन्द्रियां अधिक प्रबल हो जाती हैं। जिस प्रकार डाक्टर मालिश, इंजेक्शन, मिक्स्चर (वेय-श्रोपधि), चूर्ण आदि नाना प्रकार के प्रयोगों द्वारा टी० वी० नाम के कीटाणु (जो यक्ष्मा या क्षय रोग का कारण है) के उपर चारों ओर से आक्रमण करता हैं, ठीक उसी प्रकार से व्रत, नियमित भोजन (मिताहार), प्राणायाम, जप, कीर्तन, ध्यान, विचार (में कौन हूँ ?) प्रत्याहार, दम, आसन, वंछ, मुद्रा, विचार- नियन्त्रण, वासना-क्षय आदि विविध उपायों द्वारा इन्द्रियों को वश में करना चाहिए।
वैराग्य
प्रकाश के सम्मुख ग्रंथकार नहीं रह सकता। इसी प्रकार इन्द्रिय-मुख भोगों के रहते हुये आत्मानन्द की प्राप्ति नहीं होती। मंगारी लोग विषय-मुख भोग तथा आत्मानन्द का मुग एक ही समय में साथ साथ उठाना चाहते