ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
को वश में कीजिए, मन आप ही वश में हो जाएगा।” (दूसरा दृष्टि कोण); इस प्रकार से कहना ठीक वैसे ही है जैसा कि यह कहना कि प्रथम बीज की उत्पत्ति हुई या वृक्ष की। अथवा यह कहना “यदि आप वासनाओं को वश में कर लेंगे तो आप आत्म ज्ञान को प्राप्त लेंगे, या यदि आप आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लेंगे तो आप अपनी सब वासनाओं को वश में कर लेंगे।” यह अटिल चक्र है।
आध्यात्मिक जीवन में भोग पदार्थों का निरन्तर चिंतन करते रहना, वास्तविक इन्द्रिय-सुख (भोग) से अधिक हानिकारक है। यदि साधना के द्वारा मन शुद्ध नहीं किया गया तो केवल बाहरी इन्द्रियों के संयम से यथोचित लाभ नहीं प्राप्त हो सकता। यद्यपि बाहरी इन्द्रियों पर नियन्त्रण कर लिया गया तथापि उनके सहकारी अंग जो अभी तक उत्तेजित और प्रबल हैं, मन पर प्रत्याक्रमण कर उसकी मानसिक ग्यथा को बढ़ाने में समर्थ होंगे।
काम-दृष्टि से वासनायें उत्पन्न होती हैं। यदि आप वस्त्र, आभूषण, पुष्प आदि अलंकारों से सुसज्जित अपनी सुन्दर माता और बहिन को देखते हैं तो आपकी दृष्टि कामातुर नहीं होती। आप उनकी ओर शुद्ध प्रेम की भावना से देखते हैं। यह शुद्ध भावना है। वहाँ कामुक विचार नहीं है। अन्य स्त्रियों की ओर भी आपको दृष्टि कोण से देखना चाहिए। इसी शुद्ध भावना की वृद्धि करने का अभ्यास कीजिए। किसी भी स्त्री की ओर काम दृष्टि से देखना, मैथुन के सुख के ही तुल्य है। यह एक प्रकार का मैथुन ही है। यही कारण है कि महात्मा जीसस कहते हैं “यदि आपने किसी स्त्री को कामभरी नसना दी