भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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कामवासनाओं की इतिश्री कीजिये

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ध्यान, कीर्तन और प्रार्थना आदि के द्वारा मन को शुद्ध करना पड़ेगा। प्रथम मन पर नियंत्रण करना चाहिए। मन को शिक्षित कीजिये। तब आपके लिये मन पर नियंत्रण करना सरल हो जायगा। तत्पश्चात् दम का अभ्यास कीजिए। मन के बिना इन्द्रियों अकेली कार्य नहीं कर सकती। इसीलिए ब्रह्मचर्य के लिये प्रथम मन को वश में करना चाहिए न कि इन्द्रियों को। ह उत्तम उपाय है।

परन्तु नये साधकों के लिये मन को वश में करना कठिन है; क्योंकि जब इन्द्रियां इधर उधर भागती रहती हैं तो मन को वश में करना अत्यन्त कठिन होता है। यही कारण है कि भगवान् श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं— “हे अर्जुन ! प्रथम तू इन्द्रियों को वश में करके पुनः इस बुद्धि और ज्ञान के नष्ट करने वाले पापी काम को मार।” अध्याय ३ श्लोक ४१।

“प्रथम मन को वश में करना चाहिए” यह सिद्धांत सर्वथा सही है। इसका अभ्यास उत्तम साधकों के लिए प्रशस्त है। सामान्य (मध्यम श्रेणी के) साधकों को प्रथम इन्द्रियों को वश में करना चाहिए। इन्द्रियों की प्रवृत्ति सदा बाहर की ओर रहती है। मन इन्द्रियों के द्वारा कार्य करता है। एक को वश में करना दूसरे को वश में करना है। इन्द्रियों को वश में करने से भी मन वश में हो जाता है, क्योंकि मन केवल इन्द्रियों का ही तो गहर (समूह) है। बिना इन्द्रियों के मन का कुछ भी प्रतित्व नहीं है।

“मन को प्रथम वश में कीजिए, इन्द्रियां सहज ही वश में हो जायंगी।” (एक दृष्टि कोण), “पहले इन्द्रियों

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