भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

करता है और यह वृत्ति पुनः संस्कार को उत्पन्न करती है। भोग से वासनायें प्रबल होती हैं। स्मरणशक्ति और विचार के द्वारा पुनः कामवासना उत्पन्न हो जाती है।

कामेच्छा को नष्ट करने में पूर्ण साधना रहिये। संसार का सृजनहार ब्रह्मा भी नहीं जानता कि काम का यथार्थ स्थान कहाँ है। गीता में आपको मिलेगा कि इन्द्रियां, मन और बुद्धि काम के वासस्थान हैं। प्राणमय कोष उसका अन्य स्थान है। काम, शरीर, मन और इन्द्रियों में सर्वत्र व्यापक है। शरीर के रग-रग, अणु-अणु और कण-कण में काम व्यापक रहता है। काम रूपी महासागर के बाह्य तथा अन्तस्थ-धारा-प्रवाहों में तृष्णा रूपी मगर तैरते रहते हैं। आपको इन सभी स्थानों में काम को संपूर्णता से नष्ट करना पड़ेगा।

अज्ञानी मनुष्य संस्कार और कर्मों का वंच (निमित्त) बना रहता है। आध्यात्मिक साधना के अभ्यास तथा वासना व अहंकार के त्याग के द्वारा वह अपने वास्तविक स्वभाव को समझने लगता है और तदनुसार वह धीरे धीरे बल प्राप्त करता है।

ब्रह्मचर्य का अर्थ नियन्त्रण से न कि काम-वासना को दवाने-से। यदि आप ध्यान, जप, प्रार्थना, स्वाध्याय, आत्मचिन्तन (मैं कौन हूँ ?) के द्वारा अपने मन में शुद्ध सात्विक विचार भरें तो आप अपनी कामवासना को मन के शमन के द्वारा निर्जांव करने में समर्थ होंगे। मन भी क्रमशः सूक्ष्म हो जायगा। अवरोधित कामेच्छा आप पर पुनः पुनः आक्रमण करेगी जिससे आपको स्वप्नदोष, चिह-चिहपन और मन में अशांति उत्पन्न होगी। पुनः आपको