भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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वासनाओं की इतिथी कीजिये

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नष्ट करना अत्यन्त कठिन है।” दृढ़ प्रतिज्ञा, धैर्य तथा तीव्र वैराग्य और विवेक से युक्त मनुष्य के लिए यह कार्य कुछ भी नहीं है। वह एक पल भर में किया जा सकता है। उचित साधना के द्वारा वासना का त्याग कीजिये। श्रन्तःकरण में गोता लगाकर तृष्णाओं के कार्यों को दृढ़िये और उन्हें समूल नष्ट कीजिये।

जिस प्रकार एक स्वर्णकार, कुस्तित स्वर्ण को बारंबार तपाकर तथा उसमें अम्पलीय पदार्थ मिला कर उसे निर्मल (शुद्ध) बना देता है, ठीक उसी प्रकार आपकी भी अपने अपवित्र मन और शरीर को निरंतर साधना के द्वारा पवित्र बनाना होगा।

एक बार कलकत्ते में गंगा पार करते हुए एक बंगाली महाराज ने क्रोध में आकर एक सिक्का महाराज के प्रति “साला नदमास” शब्द का प्रयोग किया। सिक्का महाराज ने उद्द्वेग में आकर तुरत उस बंगाली महाराज को पकड़ कर गंगा में फेंक दिया। वे बंगाली महाराज डूब कर मर गये। देखिये ! वे सिक्का महानुभाव मन से कितने दुर्बल थे, यद्यपि वे शरीर से बलवान थे। एक ही शब्द के भ्रमण से उनके मन की स्थिरता नष्ट हो गई। वे क्रोध के गुलाम बन गये। यदि उच्चमं ब्रह्मचर्य, विवेक और विचार होता तो वे पृथ्वी पूर्वक इस असम्य कार्य को कदापि नहीं करते।

काम एक प्रकार की तीव्र इच्छा है। बार बार दुहराते रहने से कोमल इच्छा तीव्र इच्छा बन जाती है। विचार ही वास्तविक कर्म है। मैथुन से चित्त में संस्कार उत्पन्न होता है। यह संस्कार मन में वृत्ति (विचारधारा) उत्पन्न