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ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

वासनाओं की इतिथी कीजिये

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नष्ट करना अत्यन्त कठिन है।” दृढ़ प्रतिज्ञा, धैर्य तथा तीव्र वैराग्य और विवेक से युक्त मनुष्य के लिए यह कार्य कुछ भी नहीं है। वह एक पल भर में किया जा सकता है। उचित साधना के द्वारा वासना का त्याग कीजिये। श्रन्तःकरण में गोता लगाकर तृष्णाओं के कार्यों को दृढ़िये और उन्हें समूल नष्ट कीजिये।

जिस प्रकार एक स्वर्णकार, कुस्तित स्वर्ण को बारंबार तपाकर तथा उसमें अम्पलीय पदार्थ मिला कर उसे निर्मल (शुद्ध) बना देता है, ठीक उसी प्रकार आपकी भी अपने अपवित्र मन और शरीर को निरंतर साधना के द्वारा पवित्र बनाना होगा।

एक बार कलकत्ते में गंगा पार करते हुए एक बंगाली महाराज ने क्रोध में आकर एक सिक्का महाराज के प्रति “साला नदमास” शब्द का प्रयोग किया। सिक्का महाराज ने उद्द्वेग में आकर तुरत उस बंगाली महाराज को पकड़ कर गंगा में फेंक दिया। वे बंगाली महाराज डूब कर मर गये। देखिये ! वे सिक्का महानुभाव मन से कितने दुर्बल थे, यद्यपि वे शरीर से बलवान थे। एक ही शब्द के भ्रमण से उनके मन की स्थिरता नष्ट हो गई। वे क्रोध के गुलाम बन गये। यदि उच्चमं ब्रह्मचर्य, विवेक और विचार होता तो वे पृथ्वी पूर्वक इस असम्य कार्य को कदापि नहीं करते।

काम एक प्रकार की तीव्र इच्छा है। बार बार दुहराते रहने से कोमल इच्छा तीव्र इच्छा बन जाती है। विचार ही वास्तविक कर्म है। मैथुन से चित्त में संस्कार उत्पन्न होता है। यह संस्कार मन में वृत्ति (विचारधारा) उत्पन्न

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ब्रह्मचर्य साधना

करता है और यह वृत्ति पुनः संस्कार को उत्पन्न करती है। भोग से वासनायें प्रबल होती हैं। स्मरणशक्ति और विचार के द्वारा पुनः कामवासना उत्पन्न हो जाती है।

कामेच्छा को नष्ट करने में पूर्ण साधना रहिये। संसार का सृजनहार ब्रह्मा भी नहीं जानता कि काम का यथार्थ स्थान कहाँ है। गीता में आपको मिलेगा कि इन्द्रियां, मन और बुद्धि काम के वासस्थान हैं। प्राणमय कोष उसका अन्य स्थान है। काम, शरीर, मन और इन्द्रियों में सर्वत्र व्यापक है। शरीर के रग-रग, अणु-अणु और कण-कण में काम व्यापक रहता है। काम रूपी महासागर के बाह्य तथा अन्तस्थ-धारा-प्रवाहों में तृष्णा रूपी मगर तैरते रहते हैं। आपको इन सभी स्थानों में काम को संपूर्णता से नष्ट करना पड़ेगा।

अज्ञानी मनुष्य संस्कार और कर्मों का वंच (निमित्त) बना रहता है। आध्यात्मिक साधना के अभ्यास तथा वासना व अहंकार के त्याग के द्वारा वह अपने वास्तविक स्वभाव को समझने लगता है और तदनुसार वह धीरे धीरे बल प्राप्त करता है।

ब्रह्मचर्य का अर्थ नियन्त्रण से न कि काम-वासना को दवाने-से। यदि आप ध्यान, जप, प्रार्थना, स्वाध्याय, आत्मचिन्तन (मैं कौन हूँ ?) के द्वारा अपने मन में शुद्ध सात्विक विचार भरें तो आप अपनी कामवासना को मन के शमन के द्वारा निर्जांव करने में समर्थ होंगे। मन भी क्रमशः सूक्ष्म हो जायगा। अवरोधित कामेच्छा आप पर पुनः पुनः आक्रमण करेगी जिससे आपको स्वप्नदोष, चिह-चिहपन और मन में अशांति उत्पन्न होगी। पुनः आपको

कामवासनाओं की इतिश्री कीजिये

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ध्यान, कीर्तन और प्रार्थना आदि के द्वारा मन को शुद्ध करना पड़ेगा। प्रथम मन पर नियंत्रण करना चाहिए। मन को शिक्षित कीजिये। तब आपके लिये मन पर नियंत्रण करना सरल हो जायगा। तत्पश्चात् दम का अभ्यास कीजिए। मन के बिना इन्द्रियों अकेली कार्य नहीं कर सकती। इसीलिए ब्रह्मचर्य के लिये प्रथम मन को वश में करना चाहिए न कि इन्द्रियों को। ह उत्तम उपाय है।

परन्तु नये साधकों के लिये मन को वश में करना कठिन है; क्योंकि जब इन्द्रियां इधर उधर भागती रहती हैं तो मन को वश में करना अत्यन्त कठिन होता है। यही कारण है कि भगवान् श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं— “हे अर्जुन ! प्रथम तू इन्द्रियों को वश में करके पुनः इस बुद्धि और ज्ञान के नष्ट करने वाले पापी काम को मार।” अध्याय ३ श्लोक ४१।

“प्रथम मन को वश में करना चाहिए” यह सिद्धांत सर्वथा सही है। इसका अभ्यास उत्तम साधकों के लिए प्रशस्त है। सामान्य (मध्यम श्रेणी के) साधकों को प्रथम इन्द्रियों को वश में करना चाहिए। इन्द्रियों की प्रवृत्ति सदा बाहर की ओर रहती है। मन इन्द्रियों के द्वारा कार्य करता है। एक को वश में करना दूसरे को वश में करना है। इन्द्रियों को वश में करने से भी मन वश में हो जाता है, क्योंकि मन केवल इन्द्रियों का ही तो गहर (समूह) है। बिना इन्द्रियों के मन का कुछ भी प्रतित्व नहीं है।

“मन को प्रथम वश में कीजिए, इन्द्रियां सहज ही वश में हो जायंगी।” (एक दृष्टि कोण), “पहले इन्द्रियों

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ब्रह्मचर्य साधना

को वश में कीजिए, मन आप ही वश में हो जाएगा।” (दूसरा दृष्टि कोण); इस प्रकार से कहना ठीक वैसे ही है जैसा कि यह कहना कि प्रथम बीज की उत्पत्ति हुई या वृक्ष की। अथवा यह कहना “यदि आप वासनाओं को वश में कर लेंगे तो आप आत्म ज्ञान को प्राप्त लेंगे, या यदि आप आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लेंगे तो आप अपनी सब वासनाओं को वश में कर लेंगे।” यह अटिल चक्र है।

आध्यात्मिक जीवन में भोग पदार्थों का निरन्तर चिंतन करते रहना, वास्तविक इन्द्रिय-सुख (भोग) से अधिक हानिकारक है। यदि साधना के द्वारा मन शुद्ध नहीं किया गया तो केवल बाहरी इन्द्रियों के संयम से यथोचित लाभ नहीं प्राप्त हो सकता। यद्यपि बाहरी इन्द्रियों पर नियन्त्रण कर लिया गया तथापि उनके सहकारी अंग जो अभी तक उत्तेजित और प्रबल हैं, मन पर प्रत्याक्रमण कर उसकी मानसिक ग्यथा को बढ़ाने में समर्थ होंगे।

काम-दृष्टि से वासनायें उत्पन्न होती हैं। यदि आप वस्त्र, आभूषण, पुष्प आदि अलंकारों से सुसज्जित अपनी सुन्दर माता और बहिन को देखते हैं तो आपकी दृष्टि कामातुर नहीं होती। आप उनकी ओर शुद्ध प्रेम की भावना से देखते हैं। यह शुद्ध भावना है। वहाँ कामुक विचार नहीं है। अन्य स्त्रियों की ओर भी आपको दृष्टि कोण से देखना चाहिए। इसी शुद्ध भावना की वृद्धि करने का अभ्यास कीजिए। किसी भी स्त्री की ओर काम दृष्टि से देखना, मैथुन के सुख के ही तुल्य है। यह एक प्रकार का मैथुन ही है। यही कारण है कि महात्मा जीसस कहते हैं “यदि आपने किसी स्त्री को कामभरी नसना दी

वैराग्य

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देखा है तो आप अपने हृदय में परखीगमन द्वारा व्यभि- चार कर चुके हैं।’ यद्यपि पहिले सात प्रकार के मैथुन से वीर्य की वास्तविक हानि नहीं होती तथापि वीर्य रक्त से पृथक हो जाता है और वह या तो निद्रा में या अन्य किसी भी रीति से अवसर प्राप्त होते ही बाहिर निकल आने का प्रयत्न करता है। पहले सात प्रकार के मैथुनों में मनुष्य मन से भोगों का उपभोग करता है।

यदि आप काम को वश में करना चाहते हैं तो जिह्वा को वश में करना आवश्यक है। प्रथम जिह्वा को वश में कीजिये; पुनः काम को वश में करना सरल हो जायगा। स्वादिष्ट राजसिक भोजन से जननेन्द्रिय को उत्तेजना प्राप्त होती है। इन्द्रियां अधिक प्रबल हो जाती हैं। जिस प्रकार डाक्टर मालिश, इंजेक्शन, मिक्स्चर (वेय-श्रोपधि), चूर्ण आदि नाना प्रकार के प्रयोगों द्वारा टी० वी० नाम के कीटाणु (जो यक्ष्मा या क्षय रोग का कारण है) के उपर चारों ओर से आक्रमण करता हैं, ठीक उसी प्रकार से व्रत, नियमित भोजन (मिताहार), प्राणायाम, जप, कीर्तन, ध्यान, विचार (में कौन हूँ ?) प्रत्याहार, दम, आसन, वंछ, मुद्रा, विचार- नियन्त्रण, वासना-क्षय आदि विविध उपायों द्वारा इन्द्रियों को वश में करना चाहिए।

वैराग्य

प्रकाश के सम्मुख ग्रंथकार नहीं रह सकता। इसी प्रकार इन्द्रिय-मुख भोगों के रहते हुये आत्मानन्द की प्राप्ति नहीं होती। मंगारी लोग विषय-मुख भोग तथा आत्मानन्द का मुग एक ही समय में साथ साथ उठाना चाहते

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ब्रह्मचर्य साधना

हैं। यह निराश असंभव है। वे संसार के विषय भोगों का त्याग नहीं कर सकते। उनके हृदय में वास्तविक वैराग्य नहीं होता। वे बातें अधिक किया करते हैं। संसारी लोगों का यही विचार रहता है कि वे सदा सुखी हैं, क्योंकि उन्हें कुछ बिसकुट, कुछ रुपये पैसे तथा स्त्री-सुख भोग मिलता रहता है। संसार में काम के द्वारा अधिक भिख-मंगों की वृद्धि होती है। संसार के सुख-भोग आरम्भ में तो अमृत की भांति मधुर प्रतीत होते हैं, परन्तु अन्त में वे ही विष की भांति घातक हो जाते हैं। जब कोई मनुष्य विवाह करके गृहस्थाश्रम में फँस जाता है तो फिर उसके लिए मोह के विविध बंधनों को तोड़ना अत्यन्त कठिन हो जाता है। एक कुंवारा कामी मनुष्य विचारता रहता है कि वह महा दुःखी है, क्योंकि उसके कोई देवाहिता स्त्री नहीं है। इस दृष्टि भंगुर जीवन के पीछे पड़े रहने के कुत्सभाव का त्याग कीजिये। निर्भय बनिये। इन्द्रियां और मन पर नियन्त्रण प्राप्त कीजिये। आप में वैराग्य की उत्पत्ति होगी। आप ब्रह्मचर्य में पूर्णतया स्थित होंगे।

क्या प्राकृत वस्तुयें सब नाशवान नहीं हैं? आप अपने शरीर के द्वारा नित्य अपने जीवन में पाप-कर्म, दुखदाई कार्य तथा अनेक अमानुषिक (अधर्मी) व्यवहार किया करते हैं। बचपन में आप अज्ञान से आघात (दुके दुये) रहते हैं। युवा अवस्था में आप काम के चंगुलों (जाल) में फँसे रहते हैं। बुढ़ापे में आप संसार के भार (बोभ) तथा शारीरिक दुर्बलता के कारण विलाप करते हैं। अन्त में आप दुखदाई मृत्यु को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार निरन्तर संलग्न आपको कब समय मिलेगा कि आप

वैराग्य

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धार्मिक कार्यों के करने में भी प्रवृत्त हों। आपका मन रूपी पिशाच इस संसार रूपी नाख्थशाला में इन्द्रियां रूपी वार्यों के साथ तान में तान मिलाकर नाचता रहता है।

धन, जो केवल आपके विचार समूहों को हवा में अमलग करने के योग्य बना सकता है, आपको नित्यानन्द की प्राप्ति नहीं करा सकता। जिस प्रकार किसी कृत्रिम में सर्पावेशित-लता में खिला हुआ पुष्प किसी अर्थ का नहीं होता, ठीक उसी प्रकार यह धन जिसके लिये मन सदा लात्तायित रहता है और जो क्षण भर में नष्ट होने वाला है, संपूर्णतः निरर्थक या अनुपयोगी है। यह जीवन, शरद काल के बादल, घृत-हीन दीपक या सागर की तरंगों की भांति क्षण भंगुर है। यह जीवन जो स्वभावतः नाशवान है तथा जो भोग पदार्थों के प्रतिपादन में क्षण भंगुर है। एक अत्यन्त घातक वस्तु है। यह शरीर जो मूत्र, विषा, मांस, हड्डी का बना हुआ है और जो कभी दुबला और कभी मोटे पन को प्राप्त होता हुआ सदा परिवर्तनशील है इस मिथ्या संसार में केवल दुःखों को भोगने के लिये ही चमत्कमाता हुआ सुन्दर सा प्रतीत होता है।

नवयुवक डाक्टर तथा अन्य कई अंगरेजी पढ़े लिये धुरन्धर विद्वान गेरुवावल्ल धारण किये हुये भूमिपिशा में आकर पछुताछ करते हैं यदि उन्हें कहीं उत्तरफाशी या गंगोत्त्री में ध्यान व योगाभ्यास के निमित्त शान्तिप्रद गुहायें प्राप्त हो सकें। राजकुमार तथा कुछ विद्वान में अनुमन्धान करने वाले नव युवक विवाहों, टॉफ, फोलर तथा रेशमी वस्त्र पहिने हुये पंजाब की ओर जाते हैं। केवल दश उद्देश्य से कि उन्हें कहीं सुन्दर

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ब्रह्मचर्य साधना

कुमारी कन्याओं की प्राप्ति हो। क्या इस संसार में दुःख है या सुख है? यदि सुख है तो फिर पढ़े लिखे व्यक्ति जंगलों में क्यों भ्रमण करते हैं? यदि दुःख है तो फिर नवयुवक धन, पद और युवतियों के पीछे क्यों भागते हैं? माया विचित्र है। जीवन तथा विश्व की पहली को समझने का प्रयत्न कीजिये।

इन्द्रिय सुख में कई दोष या विकार हैं। उसमें विविध प्रकार के पाप; दुःख, दुर्बलता, आसक्ति, दाम्बत्व, मूर्खता, अधिक परिश्रम, वासना तथा मन की अशांति आदि दोष भरे रहते हैं। जिस प्रकार गली में इधर उधर भटकने वाला कुत्ता हर समय पंथरों की मार खाते रहने पर भी घर घर द्वार द्वार जाने से बाज नहीं आता, ठीक उसी प्रकार संसारी लोग भी बार बार धक्के, लातें, मुक्के खाते व अस्वस्थ दुःख पाते थके, विचार-परायण हो यथार्थ ज्ञान को प्राप्त नहीं करते।

काम से अधिक घातक विष संसार में नहीं है। विष तो केवल एक ही शरीर को दूषित करता है, परन्तु काम जन्म-जन्म में उत्पन्न होने वाले शरीरों को ग्रह करता है। संसार में एक और विन्धुओं की भर मार है तो दूसरी ओर सपों की। आपको मक्खियां, पिस्स, खटमल, मच्छर, तथा कंटकों का दुःख अलग ही है। शीष्म भ्रष्ट में आपको धूप तप्त करती है, तो जाड़े में सर्दी सताती है। इन्मनुएन्जा, प्लेग, रॉमल-पोकस, (चेचक या शितला) भूकंप, भय, अज्ञान, दुःख, शोक आदि अनेक प्रकार के रोग और चिन्तायें आपको हर समय मत्स्य करने की ताक में रहते हैं।

ब्रह्मचर्य का अभ्यास सौ पुरुष दोनों को करना

वैराग्य

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चाहिये। स्त्रियों को भी पुरुष के नाशवान शरीर के अंगों का मानसिक चिंतन करते रहना चाहिए। ताकि उन्हें पुरुष के मांसल स्थूल शरीर से घृणा व वैराग्य की उत्पत्ति होती रहे।

काम एक प्रबल शक्ति है जिससे बचना अत्यन्त कठिन है। कुसंगति तथा आमक आधुनिक असम्भ्यता के कारण युवक युवतियों के मनस अशुद्ध संस्कारों व वासनाओं से सने रहते हैं। केवल कामसंबंधी वार्तालाप में ही वे निमग्न रहते हैं। इसलिए मैं जनता को यह सूचित कर देना चाहता हूँ कि कामोत्तेजक सभी वस्तुओं का त्याग कीजिये।

काम से घृणा करनी चाहिये न कि स्त्रियों से। वास्तव में स्त्री मां शक्ति के रूप में पूजने योग्य है। वही इस विश्व को उत्पन्न कर उसका पोषण करने वाली है। आरम्भ से जब तक पूर्ण विवेक और वैराग्य प्राप्त न हो जाय, तब तक स्त्री संघ को विप की भांति घातक समझना चाहिये। जब आप विवेक और वैराग्य प्राप्त कर लेंगे तो पुनः काम आपका कुछ भी नहीं विगाड़ सकता। आप यह जानने और अनुभव करने लगेंगे “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”—यह सब केवल ब्रह्म है। यदि आप इस पुस्तक में जहां-जहां पढ़ें “दृष्टि कोण को बदलिये” तो आप इस विषय को अच्छी प्रकार से समझ लेंगे।

एक विद्यायां ने मुझे लिखा है “स्त्री का अपवित्र मांसल शरीर मुझे अत्यन्त पवित्र व उत्तम प्रतीत होता है : “मैं कामातुर हो जाता हूँ। मैं मानव-भाव को हृदयांकित करने का पूर्ण प्रयत्न करता हूँ। मैं स्त्री को देखते ही उसके वाली का स्वरूप मान कर उसे मानसिक प्रणा

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ब्रह्मचर्य साधना

करता हूँ, परन्तु इस पर भी मेरा मन कामासक्त रहता है। ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिये? मुझे मैं सुन्दर स्त्रियों की और गुप्त-दृष्टिपात करने की लालसा ज्यों की त्यों बनी हुई।” उसके मन में विवेक और वैराग्य का उदय नहीं हुआ है। पूर्व के दूषित संस्कार और वासनायें अत्यन्त प्रबल हैं।

इंद्रिय सुख भोगों के प्रति उदासीन रहना ही वैराग्य है। किसी संबंधी की मृत्यु, धन के नारा तथा जीवन में नैराश्य आदि आकस्मिक घटनाओं के कारण जो क्षणिक वैराग्य होता है, उसे कारण वैराग्य कहते हैं। इस वैराग्य से आध्यात्मिक उन्नति में पर्याप्त सहायता नहीं मिल सकती। मन अक्सर हड़ता रहता है। और ज्योंही अक्सर प्राप्त हुआ कि वह विषय-पदार्थ को ग्रहण कर लेगा। जिन मनुष्यों में व्यवहार ज्ञान और इच्छा शक्ति की मात्रा अधिक होती है, केवल वे ही समय पर वास्तविक वैराग्य को प्राप्त करते हैं, अन्य नहीं। ऐसे बहुत कम होते हैं।

निरंतर स्मरण रखिये “भगवान की कृपा के द्वारा मैं दिनोंदिन पवित्र होता जा रहा हूँ।” सुख भोग ज्ञाते हैं, परंतु सदा रहने के लिये नहीं। यह अनित्य शरीर मृतिका मात्र है। प्रत्येक वस्तु नाशवान है। ब्रह्मचर्य ही एक मात्र उपाय है। विवेक और वैराग्य की वृद्धि कीजिये।

यदि आप वैराग्य की वृद्धि करें, यदि आप अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करें और यदि आप इस क्षण-भंगुर संसार के अवास्तविक और अशिक्षा ईन्द्रिय-सुख भोगों का, विषा या विपकी भाँति त्याग कर दें तो फिर संसार का अन्य कोई भी पदार्थ आपको प्रलोभन में नहीं

वैराग्य

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डाल सकता । काम तथा अन्य सांसारिक पदार्थों की ओर आप का तनिक भी आकर्षण नहीं होगा । काम आप को बाधित नहीं करसकता । आपको नित्य और अनंत सुख व शान्ति की प्राप्ति होगी ।

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सातवां अध्याय

आहार संबंधी नियम

“जैसे खावे अन्न वैसो होवे मन”—भोजन आहार की शुद्धि से मन की शुद्धि होती है। भोजन जो हम खाते हैं उस में वह शक्ति विद्यमान है जो मन और शरीर को संयोजित करती है। विविध प्रकार के भोजन मन पर विविध प्रकार के प्रभाव डालते हैं। कुछ ऐसे आहार हैं जो मन और शरीर दोनों को बलवान और स्थिर बनाते हैं। इसलिए यह परमावश्यक है कि हम सदा शुद्ध और सात्विक भोजन करें। आहार का ब्रह्मचर्य के साथ घनिष्ठ संबंध है। यदि भोजन की शुद्धि पर उचित ध्यान दिया जाय तो

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आहार संबंधी नियम

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ब्रह्मचर्य के संरक्षण में अत्यन्त सुगमता प्राप्त होगी । “जब आहार शुद्ध है तो मन और बुद्धि भी शुद्ध है । जब मन आत्मा, सूक्ष्म और कारण शरीर शुद्ध हो जाते हैं तो पूर्वजन्मों की स्मरण या धारण-शक्ति निश्चय पूर्वक बढ़ जाती है । जब स्मरण शक्ति के बढ़नेसे अनंत भूत और भविष्य का ज्ञान हो जाता है तो हृदय की गंधियों खुल जाती हैं तथा मनुष्य अपनी अहंकार मयी आसक्तियों को त्याग सार्वभौमिक आत्मा के साथ संसर्ग प्राप्त करता है । ऐसे मनुष्य को भगवान स्वयं आत्मज्ञान का प्रकाशन करते हैं ।”

यह कहना अनावश्यक है कि ब्रह्मचर्य के रक्षण में आहार का भी अपना एक विशिष्ट स्थान है । भोजन पदार्थों का प्रभाव जो मस्तिष्क, विचार, काम, क्रोध आदि पर पड़ता है, वह विलक्षण है । मस्तिष्क में कई भिन्न भिन्न स्थान हैं और प्रत्येक आहार-पदार्थ प्रत्येक स्थान पर तथा विस्तृत शरीर पर अपना एक विशिष्ट प्रभाव उत्पादन करता है । गोरधे (एक प्रकार की ब्दिच्या) का पकवान कामोद्दीपक प्रभाव की उत्पत्ति करता है । वह जननेन्द्रियों को तत्क्षण उत्तेजित करता है । लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडे आदि काम को उत्तेजित करते हैं । ध्यान दीजिये कि हाथी और गायें जो घास खाकर जीवन व्यतीत करते हैं, कैसे शान्त और निश्चल होते हैं तथा शेर और अन्य मांसाहारी पशु जो मांस खाकर ही जीते हैं, वे कैसे भयंकर और निर्दई होते हैं । ब्रह्मचर्य के संरक्षण में सहायता प्रदान करने वलि भोजन पदार्थों के चुनाव में अंतः प्रेरणा ही आपका पथ प्रदर्शन करेगी । आप अन्य वयो-वृद्ध अनुभवी पुरुषों से भी समाति ग्रहण कर सकते हैं ।

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ब्रह्मचर्य साधना

सात्विक भोजन

चेरू, हवि अन्नम, दूध, गेहूँ, जौ, रोटी, घी, मक्खन, सोंठ, दाल (मूँगकी), आलू, खजूर, केले, दही, बादाम और फल—ये सात्विक भोजन के पदार्थ हैं। उबाले हुये सफेद चावल, घी, चीनी और दूध के मिलाव को चेरू कहते हैं। हविस अन्न भी इसी प्रकार से बनता है। आध्यात्मिक साधकों के लिये यह बहुत लाभदायक है। दूध, स्वयं एक पूर्ण भोजन है क्योंकि उसमें मित्र मित्र पौष्टिक अंश समुचित परिमाण में होते हैं। योगी और ब्रह्मचारियों के लिये यह एक आदर्श भोजन है। फल अधिक शक्ति देने वाले हैं। केला, अंगूर, मीठे संतरे, सेब, अनार, और आम ये सब स्वास्थ्‍य प्रद और पुष्टिकर फल हैं।

सूखे फल जैसे मुनक्का, छोटी दाख, खजूर, अंजीर, मीठे ताजे फल जैसे अनार, आम, केला, सपोटा, तरबूज, मीठे अनार, चीनी (शकर), मिश्री, शहद, साबूदाना, आरासू, दूध, मक्खन, गौघृत, कच्चे नारियल का पानी, नारियल की गिरी, बादाम, पिस्ता, तूर की दाल, रागी, जौ, मक्की, गेहूँ, मूँग, धान (छिलका सहित लाल चावल), स्वादिष्ट सुगंधित चावल, तथा इन धानों के बने हुए सभी पदार्थ और सफेद कदू—ये सब ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये योग्य या उचित पदार्थ हैं।

त्याज्य भोजन

अत्यन्त स्वादिष्ट भोजन, उष्ण कदी, चटनी, मिर्च, मांस, मछली, अंडे, तंबाखू, मदिरा, खट्टे पदार्थ, तेल (सब प्रकार के), लहसुन, प्याज, कड़ये पदार्थ, खटा दही, नीरस या फीके भोजन, खट्टे, कड़ज करने वाले उत्तेजक

त्याज्य भोजन

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पदार्थ तथा भूने हुये पदार्थ, अधिक पके हुये और कच्चे फल, सहज में पचने वाली भारी तरकारियाँ, नमक तथा अन्य द्वार पदार्थ तनिक भी लाभदायक नहीं हैं। प्याज और लहसुन तो मांस से भी अधिक निकुष्ट हैं। अत्यधिक नमक खाना छोड़ दें तो आपको जिह्वा, मन तथा अन्य इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने में पूरी सहायता मिलेगी।

सर्व प्रकार के मटर और सेम (ताजे या भूने हुए) सब प्रकार के चने, धान, सरसों, सब प्रकार की मिर्चें, हींग, मसूर, वैंगन, भिंडी, ककड़ी, धतूरा (सफेद और लाल), वांस के नये पत्ते, तारबुल्लाका फल, सब प्रकार का कद्दू, मूली, लीक (प्याजके प्रकार की एकगांठदार वन वनस्पती। मरासूम (छत्रक या कुकुर मुत्ता), तेल या घी में भूने हुये पदार्थ, आचार या सुरन्ध्रे, भूने हुए चावल, सीसम के बीज, चाय, काफी, कोको, वे पदार्थ जिन से घागु या बदहजमी रोक, दुःख, अन्य रोग उत्पन्न हो, मैद के बने हुए पदार्थ पुरकी और जलन उत्पन्न करने वाले भोजन, खारे पट्टे, नमकीन, अधिक गर्म और उत्तेजक भोजन, तंबाखू अफीम, भंग, शराब आदि तृशीले पदार्थ, रूखे, वासी या टंटे पदार्थ जिन का रंग, रूप, सुगंध और स्वाभाविक स्वाद नष्ट हो गया; मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों आदि से खाकर भूठे किये हुये पदार्थ जिन में धूल, केश, या फूसकाटे पड़े हुए हों; भैंस, बकरी या भेड़ का दूध, ये सब त्याज्य हैं, क्योंकि ये स्वभावतया राजसिक हैं। आंवले का फल, नींबू का रस, गंधा नमक अदरक, सांठ सम्भाव में काम में लामे जासकते हैं।

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ब्रह्मचर्य साधना

मिताहार

भोजन में संयम रखना ही मिताहार कहलाता है। स्वास्थ्ययद सात्विक भोजन आपके पेटभर खाइये। चौथाई पेट पानी से भरिये, बने हुए एक चौथाई भाग को हवा के लिये खाली छोड़ दीजिये। यह मिताहार है। ब्रह्मचारियों को नित्य मिताहारी होना चाहिये। रात्रि के भोजन के संबंध में उन्हें अधिक सावधान रहना चाहिये। रात्रि में उन्हें भर पेट भोजन नहीं करना चाहिये। अधिक भोजन ही रात्रि में स्वप्नदोष का कारण है। पेटू (भोजन भट्ट) कभी स्वप्न में भी ब्रह्मचारी नहीं बन सकता। यदि आप ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहते हैं तो जिह्वा का संयम परमावश्यक है। जिह्वा और जननेन्द्रिय के बीच में वनिष्ठ संबंध है। जिह्वा एक ज्ञानेन्द्रिय है। वह जल तन्मात्रा के सात्विक भाग से बनी हुई है। जननेन्द्रिय एक कर्मेन्द्रिय है। वह जल तन्मात्रा के राजसिक अंश से बनी हुई है। वे दोनों बहिन हैं क्योंकि उन दोनों का आधार एक ही है। यदि जिह्वा राजसिक भोजन के द्वारा उत्तेजित होती है तो जननेन्द्रिय भी तत्काल उत्तेजित हो जाती है। भोजन में संकलन (चुनाव) और नियन्त्रण होना चाहिये। ब्रह्मचारी का भोजन सादा, मृदु (कोमल), मसाला रहित, और अनुत्तेजक होना चाहिये। भोजन में संयम की पूरी पूरी आवश्यकता है। पेट को ठूस कर भर लेना अत्यन्त घातक है। फल परम लाभदायक हैं। भोजन आपको केवल उसी समय करना चाहिये जब आप वास्तव में भूले हों। कभी कभी पेट आपको छोखा देगा। आपको भूद मृद की भूल प्रतीत होगी। परन्तु उशाही आप भोजन करने के लिये

व्रत तथा ब्रह्मचर्य

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बैठेंगे कि आपको भूल नहीं प्रतीत होगी और न आपको भोजन स्वादिष्ट ही लगेगा। मन के नियन्त्रण और ब्रह्मचर्य की प्राप्ति के लिये नियमित भोजन और व्रत अत्यन्त सहायक हैं। इनको कभी भी तुच्छ समझ कर अस्वीकार न कीजिये।

व्रत (उपवास) तथा ब्रह्मचर्य

व्रत से कामवासना का नियन्त्रण होता है। उससे भावुकता शांत होती है। वह इन्द्रियों को भी वश में करता है। व्रत एक बड़ा भारी तप है। वह मन को पवित्र बनाता है। उससे अनेकानेक पाप नष्ट होते हैं। चन्द्रायण, कुल्लु, एकादशी और प्रदोष ये सब मन की शुद्धि के लिये शास्त्र-सम्मत व्रत हैं। व्रत से विशेष कर जिहा—जो आप की परम शत्रु है—का नियन्त्रण होता है। जब आप व्रत रखें तो मन में स्वादिष्ट भोजनों का विचार उत्पन्न न होने दें। यदि ऐसा न करेंगे तो आपको अधिक लाभ नहीं होगा। व्रत स्वांस संबंधी, रक्त संबंधी, पाचन संबंधी तथा मूत्र संबंधी कौनों को शुद्ध करता है। वह शरीर के सब प्रकार के मल तथा सब प्रकार के विष का नाश करता है। वह खट्टे तीखे पदार्थ-संग्रह को कम करता है। जिस प्रकार अशुद्ध होने को बार बार अग्नि में तपा कर शुद्ध किया जाता है, ठीक उसी प्रकार बार बार व्रत करने से मन को भी शुद्ध किया जाता है। नवयुवक दृष्टिपूर्व ब्रह्मचारियों को चाहिए कि जब कभी उन्हें काम सताने लगे तो तुरंत अनारार व्रत धारण करले। व्रत के तमय जब मन शांत होता है तो ध्यान बहुत अच्छा होगा। व्रत के समय जब सब इन्द्रियां शांत रहती हैं तो ध्यान का लूट अभ्यास करना चाहिये, यही व्रत का मुख्य उद्देश्य है। सब इन्द्रियों

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ब्रह्मचर्य साधना

को विषयों से हटाकर मन को भगवान में एकाग्र कर देना चाहिये। प्रकाश दिखाकर आपको पथ-प्रदर्शन करने के लिये, भगवान से प्रार्थना कीजिये। भाव सहित प्रार्थना कीजिये “हे भगवान मुझे पथ-प्रदर्शन कीजिये, मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपका हूँ” आप को पवित्रता, प्रकाश, बल और ज्ञान की प्राप्ति होगी। व्रत योग के दश नियमों में से एक नियम है आर्यधिक व्रत न करें उससे दुर्बलता प्राप्त होगी। अपनी साधारण बुद्धि से काम लीजिये। जो मनुष्य पूर्ण व्रत रखने में असमर्थ हों, वे केवल नौ या बारह घंटे तक ही व्रत रखने और तब शार्यकाल या रात्रि में दूध या फल ग्रहण कर सकते हैं। पेट, यकृत, आदि पाचन किया संबंधी इंद्रियों को व्रत के समय, विश्राम मिलता है। जो पेटू या निरंतर खाने वाले मनुष्य हैं, वे अपनी इंद्रियों को चंद मिन्टों के लिये भी विश्राम नहीं देते। यही कारण है कि उनकी ये इंद्रियाँ शीघ्र रोगग्रस्त होजाती हैं मधुमेह, मंदाग्नि और यकृत (जिगर) आदि के रोग आर्यधिक अहार के ही कारण होते हैं। वास्तव में देखा जाय तो मनुष्य को बहुत ही अल्प भोजन की आवश्यकता है। नन्हे फी सदी मनुष्य संसार में आवश्यकता से अधिक भोजन करते हैं। आवश्यकता से अधिक खाने का उन का स्वभाव पड़ गया है। सब रोगों का कारण आर्यधिक भोजन ही है। उत्तम स्वास्थ्य बनाये रखने, आंतरिक इंद्रियों को विश्राम देने तथा ब्रह्मचर्य का अवलंबन करने के लिये समय समय पर व्रत रखना प्रत्येक मनुष्य के लिये परमावश्यक है। कई रोग जिन को एलोपैथी और डाक्टरों ने असाध्य घोषित कर रखा है व्रत या निराहार के द्वारा

आठवां अध्याय

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ब्रह्मचर्य साधना

जप कीजिये। व्रत अधिकतर धार्मिक किया है। न कि स्वास्थ्य के दृष्टि कोण से केवल शारीरिक स्थूल किया। आप को चाहिये कि आप व्रत के दिनों को उच्चतर आध्यात्मिक साधनों तथा भगवत् चिंतन के काम में लावें। नित्य ईश्वर संबंधी विचारों को ही ग्रहण करें। इस विश्व की उत्पत्ति क्यों और किसलिये हुई इत्यादि जीवन के गंभीर प्रश्नों पर पूर्ण विचार कीजिये। अन्वेषण कीजिये “मैं कौन हूँ ?” “यह आत्मा या ब्रह्म क्या है ?” “ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने की विधि और साधन क्या हैं ?” “भगवान् के समीप किस प्रकार पहुँचाजाय ?” पुनः अपनी नित्यानन्द अवस्था का अनुभव कीजिये और सदा पवित्रता की स्थिति में स्थित रहिये।

ऐ मेरे प्रिय बन्धुओं ! क्या आप इन पक्तियों को पढ़ते ही तत्क्षण व्रत रूपी तपश्चर्या का श्री गणेश करेंगे तथा अपने अनुभव का सही सही वृत्तान्त मुझे लिख भेजने का प्रयत्न करेंगे ? ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

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