भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 99

८४

ब्रह्मचर्य साधना

करता हूँ, परन्तु इस पर भी मेरा मन कामासक्त रहता है। ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिये? मुझे मैं सुन्दर स्त्रियों की और गुप्त-दृष्टिपात करने की लालसा ज्यों की त्यों बनी हुई।” उसके मन में विवेक और वैराग्य का उदय नहीं हुआ है। पूर्व के दूषित संस्कार और वासनायें अत्यन्त प्रबल हैं।

इंद्रिय सुख भोगों के प्रति उदासीन रहना ही वैराग्य है। किसी संबंधी की मृत्यु, धन के नारा तथा जीवन में नैराश्य आदि आकस्मिक घटनाओं के कारण जो क्षणिक वैराग्य होता है, उसे कारण वैराग्य कहते हैं। इस वैराग्य से आध्यात्मिक उन्नति में पर्याप्त सहायता नहीं मिल सकती। मन अक्सर हड़ता रहता है। और ज्योंही अक्सर प्राप्त हुआ कि वह विषय-पदार्थ को ग्रहण कर लेगा। जिन मनुष्यों में व्यवहार ज्ञान और इच्छा शक्ति की मात्रा अधिक होती है, केवल वे ही समय पर वास्तविक वैराग्य को प्राप्त करते हैं, अन्य नहीं। ऐसे बहुत कम होते हैं।

निरंतर स्मरण रखिये “भगवान की कृपा के द्वारा मैं दिनोंदिन पवित्र होता जा रहा हूँ।” सुख भोग ज्ञाते हैं, परंतु सदा रहने के लिये नहीं। यह अनित्य शरीर मृतिका मात्र है। प्रत्येक वस्तु नाशवान है। ब्रह्मचर्य ही एक मात्र उपाय है। विवेक और वैराग्य की वृद्धि कीजिये।

यदि आप वैराग्य की वृद्धि करें, यदि आप अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करें और यदि आप इस क्षण-भंगुर संसार के अवास्तविक और अशिक्षा ईन्द्रिय-सुख भोगों का, विषा या विपकी भाँति त्याग कर दें तो फिर संसार का अन्य कोई भी पदार्थ आपको प्रलोभन में नहीं

ब्रह्मचर्य साधना · पृष्ठ 99, कुल 237 में से · BharatKosha