भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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वैराग्य

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चाहिये। स्त्रियों को भी पुरुष के नाशवान शरीर के अंगों का मानसिक चिंतन करते रहना चाहिए। ताकि उन्हें पुरुष के मांसल स्थूल शरीर से घृणा व वैराग्य की उत्पत्ति होती रहे।

काम एक प्रबल शक्ति है जिससे बचना अत्यन्त कठिन है। कुसंगति तथा आमक आधुनिक असम्भ्यता के कारण युवक युवतियों के मनस अशुद्ध संस्कारों व वासनाओं से सने रहते हैं। केवल कामसंबंधी वार्तालाप में ही वे निमग्न रहते हैं। इसलिए मैं जनता को यह सूचित कर देना चाहता हूँ कि कामोत्तेजक सभी वस्तुओं का त्याग कीजिये।

काम से घृणा करनी चाहिये न कि स्त्रियों से। वास्तव में स्त्री मां शक्ति के रूप में पूजने योग्य है। वही इस विश्व को उत्पन्न कर उसका पोषण करने वाली है। आरम्भ से जब तक पूर्ण विवेक और वैराग्य प्राप्त न हो जाय, तब तक स्त्री संघ को विप की भांति घातक समझना चाहिये। जब आप विवेक और वैराग्य प्राप्त कर लेंगे तो पुनः काम आपका कुछ भी नहीं विगाड़ सकता। आप यह जानने और अनुभव करने लगेंगे “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”—यह सब केवल ब्रह्म है। यदि आप इस पुस्तक में जहां-जहां पढ़ें “दृष्टि कोण को बदलिये” तो आप इस विषय को अच्छी प्रकार से समझ लेंगे।

एक विद्यायां ने मुझे लिखा है “स्त्री का अपवित्र मांसल शरीर मुझे अत्यन्त पवित्र व उत्तम प्रतीत होता है : “मैं कामातुर हो जाता हूँ। मैं मानव-भाव को हृदयांकित करने का पूर्ण प्रयत्न करता हूँ। मैं स्त्री को देखते ही उसके वाली का स्वरूप मान कर उसे मानसिक प्रणा