भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

कुमारी कन्याओं की प्राप्ति हो। क्या इस संसार में दुःख है या सुख है? यदि सुख है तो फिर पढ़े लिखे व्यक्ति जंगलों में क्यों भ्रमण करते हैं? यदि दुःख है तो फिर नवयुवक धन, पद और युवतियों के पीछे क्यों भागते हैं? माया विचित्र है। जीवन तथा विश्व की पहली को समझने का प्रयत्न कीजिये।

इन्द्रिय सुख में कई दोष या विकार हैं। उसमें विविध प्रकार के पाप; दुःख, दुर्बलता, आसक्ति, दाम्बत्व, मूर्खता, अधिक परिश्रम, वासना तथा मन की अशांति आदि दोष भरे रहते हैं। जिस प्रकार गली में इधर उधर भटकने वाला कुत्ता हर समय पंथरों की मार खाते रहने पर भी घर घर द्वार द्वार जाने से बाज नहीं आता, ठीक उसी प्रकार संसारी लोग भी बार बार धक्के, लातें, मुक्के खाते व अस्वस्थ दुःख पाते थके, विचार-परायण हो यथार्थ ज्ञान को प्राप्त नहीं करते।

काम से अधिक घातक विष संसार में नहीं है। विष तो केवल एक ही शरीर को दूषित करता है, परन्तु काम जन्म-जन्म में उत्पन्न होने वाले शरीरों को ग्रह करता है। संसार में एक और विन्धुओं की भर मार है तो दूसरी ओर सपों की। आपको मक्खियां, पिस्स, खटमल, मच्छर, तथा कंटकों का दुःख अलग ही है। शीष्म भ्रष्ट में आपको धूप तप्त करती है, तो जाड़े में सर्दी सताती है। इन्मनुएन्जा, प्लेग, रॉमल-पोकस, (चेचक या शितला) भूकंप, भय, अज्ञान, दुःख, शोक आदि अनेक प्रकार के रोग और चिन्तायें आपको हर समय मत्स्य करने की ताक में रहते हैं।

ब्रह्मचर्य का अभ्यास सौ पुरुष दोनों को करना