भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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वैराग्य

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धार्मिक कार्यों के करने में भी प्रवृत्त हों। आपका मन रूपी पिशाच इस संसार रूपी नाख्थशाला में इन्द्रियां रूपी वार्यों के साथ तान में तान मिलाकर नाचता रहता है।

धन, जो केवल आपके विचार समूहों को हवा में अमलग करने के योग्य बना सकता है, आपको नित्यानन्द की प्राप्ति नहीं करा सकता। जिस प्रकार किसी कृत्रिम में सर्पावेशित-लता में खिला हुआ पुष्प किसी अर्थ का नहीं होता, ठीक उसी प्रकार यह धन जिसके लिये मन सदा लात्तायित रहता है और जो क्षण भर में नष्ट होने वाला है, संपूर्णतः निरर्थक या अनुपयोगी है। यह जीवन, शरद काल के बादल, घृत-हीन दीपक या सागर की तरंगों की भांति क्षण भंगुर है। यह जीवन जो स्वभावतः नाशवान है तथा जो भोग पदार्थों के प्रतिपादन में क्षण भंगुर है। एक अत्यन्त घातक वस्तु है। यह शरीर जो मूत्र, विषा, मांस, हड्डी का बना हुआ है और जो कभी दुबला और कभी मोटे पन को प्राप्त होता हुआ सदा परिवर्तनशील है इस मिथ्या संसार में केवल दुःखों को भोगने के लिये ही चमत्कमाता हुआ सुन्दर सा प्रतीत होता है।

नवयुवक डाक्टर तथा अन्य कई अंगरेजी पढ़े लिये धुरन्धर विद्वान गेरुवावल्ल धारण किये हुये भूमिपिशा में आकर पछुताछ करते हैं यदि उन्हें कहीं उत्तरफाशी या गंगोत्त्री में ध्यान व योगाभ्यास के निमित्त शान्तिप्रद गुहायें प्राप्त हो सकें। राजकुमार तथा कुछ विद्वान में अनुमन्धान करने वाले नव युवक विवाहों, टॉफ, फोलर तथा रेशमी वस्त्र पहिने हुये पंजाब की ओर जाते हैं। केवल दश उद्देश्य से कि उन्हें कहीं सुन्दर