ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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चाहिये। स्त्रियों को भी पुरुष के नाशवान शरीर के अंगों का मानसिक चिंतन करते रहना चाहिए। ताकि उन्हें पुरुष के मांसल स्थूल शरीर से घृणा व वैराग्य की उत्पत्ति होती रहे।
काम एक प्रबल शक्ति है जिससे बचना अत्यन्त कठिन है। कुसंगति तथा आमक आधुनिक असम्भ्यता के कारण युवक युवतियों के मनस अशुद्ध संस्कारों व वासनाओं से सने रहते हैं। केवल कामसंबंधी वार्तालाप में ही वे निमग्न रहते हैं। इसलिए मैं जनता को यह सूचित कर देना चाहता हूँ कि कामोत्तेजक सभी वस्तुओं का त्याग कीजिये।
काम से घृणा करनी चाहिये न कि स्त्रियों से। वास्तव में स्त्री मां शक्ति के रूप में पूजने योग्य है। वही इस विश्व को उत्पन्न कर उसका पोषण करने वाली है। आरम्भ से जब तक पूर्ण विवेक और वैराग्य प्राप्त न हो जाय, तब तक स्त्री संघ को विप की भांति घातक समझना चाहिये। जब आप विवेक और वैराग्य प्राप्त कर लेंगे तो पुनः काम आपका कुछ भी नहीं विगाड़ सकता। आप यह जानने और अनुभव करने लगेंगे “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”—यह सब केवल ब्रह्म है। यदि आप इस पुस्तक में जहां-जहां पढ़ें “दृष्टि कोण को बदलिये” तो आप इस विषय को अच्छी प्रकार से समझ लेंगे।
एक विद्यायां ने मुझे लिखा है “स्त्री का अपवित्र मांसल शरीर मुझे अत्यन्त पवित्र व उत्तम प्रतीत होता है : “मैं कामातुर हो जाता हूँ। मैं मानव-भाव को हृदयांकित करने का पूर्ण प्रयत्न करता हूँ। मैं स्त्री को देखते ही उसके वाली का स्वरूप मान कर उसे मानसिक प्रणा
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करता हूँ, परन्तु इस पर भी मेरा मन कामासक्त रहता है। ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिये? मुझे मैं सुन्दर स्त्रियों की और गुप्त-दृष्टिपात करने की लालसा ज्यों की त्यों बनी हुई।” उसके मन में विवेक और वैराग्य का उदय नहीं हुआ है। पूर्व के दूषित संस्कार और वासनायें अत्यन्त प्रबल हैं।
इंद्रिय सुख भोगों के प्रति उदासीन रहना ही वैराग्य है। किसी संबंधी की मृत्यु, धन के नारा तथा जीवन में नैराश्य आदि आकस्मिक घटनाओं के कारण जो क्षणिक वैराग्य होता है, उसे कारण वैराग्य कहते हैं। इस वैराग्य से आध्यात्मिक उन्नति में पर्याप्त सहायता नहीं मिल सकती। मन अक्सर हड़ता रहता है। और ज्योंही अक्सर प्राप्त हुआ कि वह विषय-पदार्थ को ग्रहण कर लेगा। जिन मनुष्यों में व्यवहार ज्ञान और इच्छा शक्ति की मात्रा अधिक होती है, केवल वे ही समय पर वास्तविक वैराग्य को प्राप्त करते हैं, अन्य नहीं। ऐसे बहुत कम होते हैं।
निरंतर स्मरण रखिये “भगवान की कृपा के द्वारा मैं दिनोंदिन पवित्र होता जा रहा हूँ।” सुख भोग ज्ञाते हैं, परंतु सदा रहने के लिये नहीं। यह अनित्य शरीर मृतिका मात्र है। प्रत्येक वस्तु नाशवान है। ब्रह्मचर्य ही एक मात्र उपाय है। विवेक और वैराग्य की वृद्धि कीजिये।
यदि आप वैराग्य की वृद्धि करें, यदि आप अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करें और यदि आप इस क्षण-भंगुर संसार के अवास्तविक और अशिक्षा ईन्द्रिय-सुख भोगों का, विषा या विपकी भाँति त्याग कर दें तो फिर संसार का अन्य कोई भी पदार्थ आपको प्रलोभन में नहीं
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डाल सकता । काम तथा अन्य सांसारिक पदार्थों की ओर आप का तनिक भी आकर्षण नहीं होगा । काम आप को बाधित नहीं करसकता । आपको नित्य और अनंत सुख व शान्ति की प्राप्ति होगी ।
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सातवां अध्याय
आहार संबंधी नियम
“जैसे खावे अन्न वैसो होवे मन”—भोजन आहार की शुद्धि से मन की शुद्धि होती है। भोजन जो हम खाते हैं उस में वह शक्ति विद्यमान है जो मन और शरीर को संयोजित करती है। विविध प्रकार के भोजन मन पर विविध प्रकार के प्रभाव डालते हैं। कुछ ऐसे आहार हैं जो मन और शरीर दोनों को बलवान और स्थिर बनाते हैं। इसलिए यह परमावश्यक है कि हम सदा शुद्ध और सात्विक भोजन करें। आहार का ब्रह्मचर्य के साथ घनिष्ठ संबंध है। यदि भोजन की शुद्धि पर उचित ध्यान दिया जाय तो
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आहार संबंधी नियम
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ब्रह्मचर्य के संरक्षण में अत्यन्त सुगमता प्राप्त होगी । “जब आहार शुद्ध है तो मन और बुद्धि भी शुद्ध है । जब मन आत्मा, सूक्ष्म और कारण शरीर शुद्ध हो जाते हैं तो पूर्वजन्मों की स्मरण या धारण-शक्ति निश्चय पूर्वक बढ़ जाती है । जब स्मरण शक्ति के बढ़नेसे अनंत भूत और भविष्य का ज्ञान हो जाता है तो हृदय की गंधियों खुल जाती हैं तथा मनुष्य अपनी अहंकार मयी आसक्तियों को त्याग सार्वभौमिक आत्मा के साथ संसर्ग प्राप्त करता है । ऐसे मनुष्य को भगवान स्वयं आत्मज्ञान का प्रकाशन करते हैं ।”
यह कहना अनावश्यक है कि ब्रह्मचर्य के रक्षण में आहार का भी अपना एक विशिष्ट स्थान है । भोजन पदार्थों का प्रभाव जो मस्तिष्क, विचार, काम, क्रोध आदि पर पड़ता है, वह विलक्षण है । मस्तिष्क में कई भिन्न भिन्न स्थान हैं और प्रत्येक आहार-पदार्थ प्रत्येक स्थान पर तथा विस्तृत शरीर पर अपना एक विशिष्ट प्रभाव उत्पादन करता है । गोरधे (एक प्रकार की ब्दिच्या) का पकवान कामोद्दीपक प्रभाव की उत्पत्ति करता है । वह जननेन्द्रियों को तत्क्षण उत्तेजित करता है । लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडे आदि काम को उत्तेजित करते हैं । ध्यान दीजिये कि हाथी और गायें जो घास खाकर जीवन व्यतीत करते हैं, कैसे शान्त और निश्चल होते हैं तथा शेर और अन्य मांसाहारी पशु जो मांस खाकर ही जीते हैं, वे कैसे भयंकर और निर्दई होते हैं । ब्रह्मचर्य के संरक्षण में सहायता प्रदान करने वलि भोजन पदार्थों के चुनाव में अंतः प्रेरणा ही आपका पथ प्रदर्शन करेगी । आप अन्य वयो-वृद्ध अनुभवी पुरुषों से भी समाति ग्रहण कर सकते हैं ।
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सात्विक भोजन
चेरू, हवि अन्नम, दूध, गेहूँ, जौ, रोटी, घी, मक्खन, सोंठ, दाल (मूँगकी), आलू, खजूर, केले, दही, बादाम और फल—ये सात्विक भोजन के पदार्थ हैं। उबाले हुये सफेद चावल, घी, चीनी और दूध के मिलाव को चेरू कहते हैं। हविस अन्न भी इसी प्रकार से बनता है। आध्यात्मिक साधकों के लिये यह बहुत लाभदायक है। दूध, स्वयं एक पूर्ण भोजन है क्योंकि उसमें मित्र मित्र पौष्टिक अंश समुचित परिमाण में होते हैं। योगी और ब्रह्मचारियों के लिये यह एक आदर्श भोजन है। फल अधिक शक्ति देने वाले हैं। केला, अंगूर, मीठे संतरे, सेब, अनार, और आम ये सब स्वास्थ्य प्रद और पुष्टिकर फल हैं।
सूखे फल जैसे मुनक्का, छोटी दाख, खजूर, अंजीर, मीठे ताजे फल जैसे अनार, आम, केला, सपोटा, तरबूज, मीठे अनार, चीनी (शकर), मिश्री, शहद, साबूदाना, आरासू, दूध, मक्खन, गौघृत, कच्चे नारियल का पानी, नारियल की गिरी, बादाम, पिस्ता, तूर की दाल, रागी, जौ, मक्की, गेहूँ, मूँग, धान (छिलका सहित लाल चावल), स्वादिष्ट सुगंधित चावल, तथा इन धानों के बने हुए सभी पदार्थ और सफेद कदू—ये सब ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये योग्य या उचित पदार्थ हैं।
त्याज्य भोजन
अत्यन्त स्वादिष्ट भोजन, उष्ण कदी, चटनी, मिर्च, मांस, मछली, अंडे, तंबाखू, मदिरा, खट्टे पदार्थ, तेल (सब प्रकार के), लहसुन, प्याज, कड़ये पदार्थ, खटा दही, नीरस या फीके भोजन, खट्टे, कड़ज करने वाले उत्तेजक
त्याज्य भोजन
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पदार्थ तथा भूने हुये पदार्थ, अधिक पके हुये और कच्चे फल, सहज में पचने वाली भारी तरकारियाँ, नमक तथा अन्य द्वार पदार्थ तनिक भी लाभदायक नहीं हैं। प्याज और लहसुन तो मांस से भी अधिक निकुष्ट हैं। अत्यधिक नमक खाना छोड़ दें तो आपको जिह्वा, मन तथा अन्य इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने में पूरी सहायता मिलेगी।
सर्व प्रकार के मटर और सेम (ताजे या भूने हुए) सब प्रकार के चने, धान, सरसों, सब प्रकार की मिर्चें, हींग, मसूर, वैंगन, भिंडी, ककड़ी, धतूरा (सफेद और लाल), वांस के नये पत्ते, तारबुल्लाका फल, सब प्रकार का कद्दू, मूली, लीक (प्याजके प्रकार की एकगांठदार वन वनस्पती। मरासूम (छत्रक या कुकुर मुत्ता), तेल या घी में भूने हुये पदार्थ, आचार या सुरन्ध्रे, भूने हुए चावल, सीसम के बीज, चाय, काफी, कोको, वे पदार्थ जिन से घागु या बदहजमी रोक, दुःख, अन्य रोग उत्पन्न हो, मैद के बने हुए पदार्थ पुरकी और जलन उत्पन्न करने वाले भोजन, खारे पट्टे, नमकीन, अधिक गर्म और उत्तेजक भोजन, तंबाखू अफीम, भंग, शराब आदि तृशीले पदार्थ, रूखे, वासी या टंटे पदार्थ जिन का रंग, रूप, सुगंध और स्वाभाविक स्वाद नष्ट हो गया; मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों आदि से खाकर भूठे किये हुये पदार्थ जिन में धूल, केश, या फूसकाटे पड़े हुए हों; भैंस, बकरी या भेड़ का दूध, ये सब त्याज्य हैं, क्योंकि ये स्वभावतया राजसिक हैं। आंवले का फल, नींबू का रस, गंधा नमक अदरक, सांठ सम्भाव में काम में लामे जासकते हैं।
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ब्रह्मचर्य साधना
मिताहार
भोजन में संयम रखना ही मिताहार कहलाता है। स्वास्थ्ययद सात्विक भोजन आपके पेटभर खाइये। चौथाई पेट पानी से भरिये, बने हुए एक चौथाई भाग को हवा के लिये खाली छोड़ दीजिये। यह मिताहार है। ब्रह्मचारियों को नित्य मिताहारी होना चाहिये। रात्रि के भोजन के संबंध में उन्हें अधिक सावधान रहना चाहिये। रात्रि में उन्हें भर पेट भोजन नहीं करना चाहिये। अधिक भोजन ही रात्रि में स्वप्नदोष का कारण है। पेटू (भोजन भट्ट) कभी स्वप्न में भी ब्रह्मचारी नहीं बन सकता। यदि आप ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहते हैं तो जिह्वा का संयम परमावश्यक है। जिह्वा और जननेन्द्रिय के बीच में वनिष्ठ संबंध है। जिह्वा एक ज्ञानेन्द्रिय है। वह जल तन्मात्रा के सात्विक भाग से बनी हुई है। जननेन्द्रिय एक कर्मेन्द्रिय है। वह जल तन्मात्रा के राजसिक अंश से बनी हुई है। वे दोनों बहिन हैं क्योंकि उन दोनों का आधार एक ही है। यदि जिह्वा राजसिक भोजन के द्वारा उत्तेजित होती है तो जननेन्द्रिय भी तत्काल उत्तेजित हो जाती है। भोजन में संकलन (चुनाव) और नियन्त्रण होना चाहिये। ब्रह्मचारी का भोजन सादा, मृदु (कोमल), मसाला रहित, और अनुत्तेजक होना चाहिये। भोजन में संयम की पूरी पूरी आवश्यकता है। पेट को ठूस कर भर लेना अत्यन्त घातक है। फल परम लाभदायक हैं। भोजन आपको केवल उसी समय करना चाहिये जब आप वास्तव में भूले हों। कभी कभी पेट आपको छोखा देगा। आपको भूद मृद की भूल प्रतीत होगी। परन्तु उशाही आप भोजन करने के लिये
व्रत तथा ब्रह्मचर्य
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बैठेंगे कि आपको भूल नहीं प्रतीत होगी और न आपको भोजन स्वादिष्ट ही लगेगा। मन के नियन्त्रण और ब्रह्मचर्य की प्राप्ति के लिये नियमित भोजन और व्रत अत्यन्त सहायक हैं। इनको कभी भी तुच्छ समझ कर अस्वीकार न कीजिये।
व्रत (उपवास) तथा ब्रह्मचर्य
व्रत से कामवासना का नियन्त्रण होता है। उससे भावुकता शांत होती है। वह इन्द्रियों को भी वश में करता है। व्रत एक बड़ा भारी तप है। वह मन को पवित्र बनाता है। उससे अनेकानेक पाप नष्ट होते हैं। चन्द्रायण, कुल्लु, एकादशी और प्रदोष ये सब मन की शुद्धि के लिये शास्त्र-सम्मत व्रत हैं। व्रत से विशेष कर जिहा—जो आप की परम शत्रु है—का नियन्त्रण होता है। जब आप व्रत रखें तो मन में स्वादिष्ट भोजनों का विचार उत्पन्न न होने दें। यदि ऐसा न करेंगे तो आपको अधिक लाभ नहीं होगा। व्रत स्वांस संबंधी, रक्त संबंधी, पाचन संबंधी तथा मूत्र संबंधी कौनों को शुद्ध करता है। वह शरीर के सब प्रकार के मल तथा सब प्रकार के विष का नाश करता है। वह खट्टे तीखे पदार्थ-संग्रह को कम करता है। जिस प्रकार अशुद्ध होने को बार बार अग्नि में तपा कर शुद्ध किया जाता है, ठीक उसी प्रकार बार बार व्रत करने से मन को भी शुद्ध किया जाता है। नवयुवक दृष्टिपूर्व ब्रह्मचारियों को चाहिए कि जब कभी उन्हें काम सताने लगे तो तुरंत अनारार व्रत धारण करले। व्रत के तमय जब मन शांत होता है तो ध्यान बहुत अच्छा होगा। व्रत के समय जब सब इन्द्रियां शांत रहती हैं तो ध्यान का लूट अभ्यास करना चाहिये, यही व्रत का मुख्य उद्देश्य है। सब इन्द्रियों
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ब्रह्मचर्य साधना
को विषयों से हटाकर मन को भगवान में एकाग्र कर देना चाहिये। प्रकाश दिखाकर आपको पथ-प्रदर्शन करने के लिये, भगवान से प्रार्थना कीजिये। भाव सहित प्रार्थना कीजिये “हे भगवान मुझे पथ-प्रदर्शन कीजिये, मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपका हूँ” आप को पवित्रता, प्रकाश, बल और ज्ञान की प्राप्ति होगी। व्रत योग के दश नियमों में से एक नियम है आर्यधिक व्रत न करें उससे दुर्बलता प्राप्त होगी। अपनी साधारण बुद्धि से काम लीजिये। जो मनुष्य पूर्ण व्रत रखने में असमर्थ हों, वे केवल नौ या बारह घंटे तक ही व्रत रखने और तब शार्यकाल या रात्रि में दूध या फल ग्रहण कर सकते हैं। पेट, यकृत, आदि पाचन किया संबंधी इंद्रियों को व्रत के समय, विश्राम मिलता है। जो पेटू या निरंतर खाने वाले मनुष्य हैं, वे अपनी इंद्रियों को चंद मिन्टों के लिये भी विश्राम नहीं देते। यही कारण है कि उनकी ये इंद्रियाँ शीघ्र रोगग्रस्त होजाती हैं मधुमेह, मंदाग्नि और यकृत (जिगर) आदि के रोग आर्यधिक अहार के ही कारण होते हैं। वास्तव में देखा जाय तो मनुष्य को बहुत ही अल्प भोजन की आवश्यकता है। नन्हे फी सदी मनुष्य संसार में आवश्यकता से अधिक भोजन करते हैं। आवश्यकता से अधिक खाने का उन का स्वभाव पड़ गया है। सब रोगों का कारण आर्यधिक भोजन ही है। उत्तम स्वास्थ्य बनाये रखने, आंतरिक इंद्रियों को विश्राम देने तथा ब्रह्मचर्य का अवलंबन करने के लिये समय समय पर व्रत रखना प्रत्येक मनुष्य के लिये परमावश्यक है। कई रोग जिन को एलोपैथी और डाक्टरों ने असाध्य घोषित कर रखा है व्रत या निराहार के द्वारा
आठवां अध्याय
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ब्रह्मचर्य साधना
जप कीजिये। व्रत अधिकतर धार्मिक किया है। न कि स्वास्थ्य के दृष्टि कोण से केवल शारीरिक स्थूल किया। आप को चाहिये कि आप व्रत के दिनों को उच्चतर आध्यात्मिक साधनों तथा भगवत् चिंतन के काम में लावें। नित्य ईश्वर संबंधी विचारों को ही ग्रहण करें। इस विश्व की उत्पत्ति क्यों और किसलिये हुई इत्यादि जीवन के गंभीर प्रश्नों पर पूर्ण विचार कीजिये। अन्वेषण कीजिये “मैं कौन हूँ ?” “यह आत्मा या ब्रह्म क्या है ?” “ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने की विधि और साधन क्या हैं ?” “भगवान् के समीप किस प्रकार पहुँचाजाय ?” पुनः अपनी नित्यानन्द अवस्था का अनुभव कीजिये और सदा पवित्रता की स्थिति में स्थित रहिये।
ऐ मेरे प्रिय बन्धुओं ! क्या आप इन पक्तियों को पढ़ते ही तत्क्षण व्रत रूपी तपश्चर्या का श्री गणेश करेंगे तथा अपने अनुभव का सही सही वृत्तान्त मुझे लिख भेजने का प्रयत्न करेंगे ? ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
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ब्रह्मचर्य रक्षण विधि
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श्रात्मा है। नाम और रूप मिथ्या है। वे मायिक चित्र हैं। श्रात्मा के अतिरिक्त उनकी कोई भी अपनी स्वयम् सत्ता नहीं है।
कामवासना छय के लिये ज्ञान योग के मार्ग में केवल ज्ञान-युद्ध साधक ही 'ब्रह्मचिन्ता' की विधि का आश्रय ले सकते हैं। अधिकंश मनुष्यों के लिये मिश्रित रीति बहुत ही अनुमूल और लाभकर है। जब शत्रु अधिक प्रबल होते हैं तो उनको नाश करने के लिये लाठियाँ, पिस्तोल, बंदूकें, मशीनगन, मन्मैरिन (जल के भीतर चलने वाली जहाज), तारपीडो (जहाजों को पैंदी तोड़ने का गोला फेंकने वाला जहाज), चम (चमगोला), विगैली गैस आदि अम्ल शस्त्रों का युक्त प्रयोग करके शत्रु को नष्ट जाता है। ठीक इसी प्रकार काम रूपी प्रबल शत्रु का नाश करने के लिये युक्त साधनों को काम में लाना परमावश्यक है।
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ब्रह्मचर्य साधना
सर्वात्तम साधना है ! अन्य जनों के लिये हठ-पौगिक कियाएँ उत्तम हैं ।
आप महीनों और वर्षों पर्यन्त मैथुन से बचे रह सकते हैं, परंतु आप के मन में काम की तनिक भी वासनायें नहीं होनी चाहिए जब आप कभी विपरीत लिंग वाले व्यक्ति के साथ में हो तो आपके मन में कुत्सित विचार भी उत्पन्न न होने चाहिये । यदि आप इस लक्ष्य में सफलता प्राप्त कर लेंगे तो आप पूर्ण ब्रह्मचर्य में स्थित होजायेंगे । आप भव सागर को पार कर चुकेगे । व्यक्ति की और देखने में कोई हानि नहीं है परंतु आपकी दृष्टि पवित्र होनी चाहिये । आप में आत्मभाव होना चाहिये । जब आप कभी किसी व्यक्ति की ओर देखें तो मन में ऐसी भावना कीजिये “हे माता आप को नमस्कार । आप मां काली की एक व्यक्त प्रतिमा हैं । मुझे प्रलोभन न दीजिये । मुझे न फुसलाइये । अब मैं माया और उनकी उत्पत्ति का भेद समझ गया हूँ । इन प्रतिमाओं को किसने सृजन किया है ? इन नाम और रूपों के पीछे एक सर्व शक्तिमान सर्वव्यापी और सर्वानंद मय लक्षण है । यह वह नश्वर असत्य सुन्दरताओं की सुन्दरता है । वह सठिका कर्ता या ईश्वर सुंदरताओं की सुंदरता है । वह अविनाशी सुंदरता की प्रतिमूर्ति है । वह सुंदरता का मुख्य आधार है । ध्यान के द्वारा मुझे इस सुंदरताओं की सुंदरता का अनुभव करना चाहिये ।” जब आप किसी आकर्षित करने वाली सुंदर आकृति या मूर्ति के रचयिता को याद रखते हुए भक्ति, प्रशंसा और आदर का भाव रखेंगे । तब आपको प्रलोभन नहीं होगा । यदि आप वेदान्त के विद्यार्थी हैं तो यह भावना कीजिये “प्रत्येक वस्तु
ब्रह्मचर्य रक्षण विधि
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आत्मा है। नाम और रूप मिथ्या है। वे मायिक चित्र हैं। आत्मा के अतिरिक्त उनकी कोई भी अपनी स्वयम् सत्ता नहीं हैं।
कामवासना क्षय के लिये ज्ञान योग के मार्ग में केवल ज्ञान-युद्ध साधक ही 'ब्रह्मविचार' की विधि का आश्रय ले सकते हैं। अधिकांश मनुष्यों के लिये मिश्रित रीति बहुत ही अनुकूल और लाभकर है। जब शत्रु अधिक प्रबल होते हैं तो उनको नाश करने के लिये लाठियाँ, पिस्तोल, बंदूकें, मशीनगन, सबमैरिन (जल के भीतर चलने वाली जहाज), तारपीडो (जहाजों की पेंदी तोड़ने का गोला फेंकने वाला जहाज), बम (बमगोला), विगैल्लो गैस आदि अस्त्र शस्त्रों का युक्त प्रयोग करके शत्रु को नष्ट जाता है। ठीक इसी प्रकार काम रूपी प्रबल शत्रु का नारा करने के लिये युक्त साधनों को काम में लाना परमानवश्यक है।
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ब्रह्मचर्य साधना
कामवासनां धीरे धीरे दूर हो जायगी। स्त्रियों से दूर भागने का प्रयत्न न कीजिए। ऐसा करने से माया और भी अधिक बल के साथ आपका पीड़ा करेगी। सब रूपों में आत्मा को देखने का प्रयत्न कीजिए तथा “ॐ एक सच्चिदानन्द आत्मा” इस मंत्र का बार बार रटन करते रहिये। आत्मा को अलिंग समझते हुए उक्त सूत्र का निरन्तर चिंतन करते रहने से आपमें बल की प्राप्ति होगी।
प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह शुद्ध आत्मा तथा अशुद्ध अनात्मा (शरीर) का विवेक (विचार) प्राप्त करने का प्रयत्न करे। उसे चाहिए कि वह स्त्री और पुंष सम्बन्धी जीवन से उत्पन्न होने वाले जो निम्न लिखित दोष हैं, उनसे सदा अपने मन को परिचित करता रहे— शक्ति का हास, इन्द्रियों की दुर्बलता, शारीरिक राग, जन्म और मृत्यु, आसक्ति तथा शरीर के विभिन्न पदार्थों जैसे मांस, रक्त, हड्डी, मल, मूत्र, पस, बलगम आदि के विषय में अनेक प्रकार की चिंता। उसे चाहिए कि वह शुद्ध अमर आत्मा तथा आध्यात्मिक जीवन (अमरत्व, निश्चानन्द और परम शान्ति की प्राप्ति) के महत्त्व को सदा ध्यान में रखे। धीरे धीरे मन स्त्री को और देखने से विरक्त हो जायगा चाहे वह कैसी ही ब्राह्मण कन्या न हो। मन उस को कुछछि से देखने में धृष्टा करने लगेगा। स्त्रियों को भी चाहिए कि वे भी अपने आपको ब्रह्मचर्य में स्थित रखने के लिए उपयुक्त अभ्यासों का अनुसरण करें।
(ब) योगियों और भक्तों का संयुक्त विधान जप (भगवान के नाम का रटन) शीर्षारुन, सर्वोग- सन्, ाद अंगुष्ठारुन, प्राशायाम, सत्संग, गीता, रामायण
योगियों और भक्तों का संयुक्त विधान
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आदि प्रन्यों का नित्य नियमित रूप से अध्ययन; सात्विक भोजन, कीर्तन, प्रार्थना, ध्यान, विचार तथा अन्य उपयोगी कार्यों में सदा मन को लगाये रखना, कुसंगति का त्याग, नाटक, सिनेमा देखना—ये सभी कार्य ब्रह्मचर्य की प्राप्ति में परम सहायक है।
स्थूल शरीर पर आसन और मुद्राओं का प्रभाव अत्यधिक पड़ सकता है। यह स्थूल विधि है। प्राणायाम का प्रभाव प्राणमय कोष पर पड़ेगा। यह सूक्ष्म विधि है। व्रत, प्रत्याहार, दम, मौन, नियमित आहार आदि से इन्द्रियां शुद्ध होंगी। जप, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग, विचार आदि से मन की शुद्धि होगी। यह मानसिक विधान है। स्थूल, प्राणिक तथा मानसिक विधानों का उचित सम्मिश्रण परमावश्यक है।
आहार पर पूरा पूरा ध्यान रखिए। मिताहारी बलिष्ठ। सात्विक भोजन (दूध, फल, गेहूँ आदि) कीजिए। तीखे पदार्थ—लहसुन, प्याज, मांस, मछली, शराब आदि काम को उत्तेजित करने वाले हैं, अतः इनका मवथा त्याग कीजिए। समय समय पर व्रत करने से कामोत्पत्ति कम होगी, आवेश शांत होगा, इन्द्रियां वश में होंगी तथा ब्रह्मचर्य में सहायता मिलेगी। सभी त्रियों के प्रति भात-भाव रखिए।
ठंडा हिप-नाथ (केवल कमर डुबा कर जल में स्नान) कीजिए। प्रातः चार बजे उठिए। स्त्री का विचार न कीजिए। स्त्री की ओर न देखिए। कामुक विचारों को शुद्ध सात्विक विचारों में परिवर्तन कीजिए। मन को सदा संलग्न रखिए। अपने संकल्प को शुद्ध और दृढ़ बनाइए। जब दीर्घ एक बार नष्ट हो गया तो पुनः उसकी पूर्ति कभी
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ब्रह्मचर्य साधना
भों नहीं हो सकती चाहे आप नादाम, पौष्टिक औषधियाँ, दूध, घी, मक्खन आदि पदार्थों का कितना भी सेवन क्यों न करें। जिन मनुष्यों ने वीर्य का रक्षण किया है उनके लिए दैविक आनन्द का राज्य-दरबार खुला है; जीवन में वे सब प्रकार की उच्चतर सिद्धियों को प्राप्त कर सकते हैं।
धन्य हैं वे योगीराज जो ऊर्ध्वरेता बन कर अपने स्वरूप में स्थित हैं। हम लोगों को चाहिए कि हम भी सभी शम, दम, विवेक, विचार, वैराग्य, प्राणायाम, जप, ध्यान के द्वारा पूर्ण ब्रह्मचर्य का अभ्यास कर जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करें। मन और इन्द्रियों का नियन्त्रण करने के लिए, अन्तरात्मा हमें आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करे। भगवान् शंकर और शान्देव की भांति हम भी ऊर्ध्वरेता योगी बनें। हम सब के प्रति उनका शुभ आशीर्वाद हो।
दृष्टिकोण परिवर्तन कीजिए
वैज्ञानिक के लिए मनुष्य एलेक्ट्रॉस का एक समूह है। स्मृति कण्ठाद के मतानुवाद वैशेषिक तत्व ज्ञानी के लिए वह त्रगु परमाणु आदि का एक पिंड है। शेर के लिए वह भोजन की वस्तु है। कामी के लिए भोग का पदार्थ है। ईषांजु इत्कियो के लिए वह एक शत्रु है। विवेकी या वैरागी के लिए वह मास, हड्डी की बनी हुई तथा मल मूत्रादि से भरी हुई एक पुतली है। पूर्ण ज्ञानी के लिए वह सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा है। “सर्वं खलिन्दं ब्रह्म” सब ब्रह्म है। जिस प्रकार रज्जु में सर्प का मिथ्या ज्ञान होता है ठीक उसी प्रकार नाम और रूप केवल मानसिक कल्पना है।
मनोभाव का परिवर्तन कीजिए। आपको इसी लोक में स्वर्ग का आनन्द प्राप्त होगा। आप ब्रह्मचर्य में पूर्णतया स्थित होने में समर्थ होंगे। सच्चा ब्रह्मचारी बनने के लिए
सत्संग का माहात्म्य
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यह एक अनुपम युक्ति है। सब स्त्रियों में आत्मा का दर्शन कीजिए। सब नाम और रूपों का परित्याग कीजिए और केवल अस्ति, भाति, प्रिय अर्थात् सत् चित् आनन्द रूपी भीतरी तथ्य को ग्रहण कीजिए। सभी नाम और रूप सत्य हैं। ये परछाईं, मृग तृष्णा, तथा आकाश में नील की भांति मिथ्या हैं।
सत्संग का माहात्म्य
सत्संग (योगी, संन्यासी और महात्माओं का संग) का माहात्म्य अकथनीय है। इसके महत्व का वर्णन भागवत, रामायण तथा अन्य ग्रन्थों में अनेक प्रकार से किया गया है। भगवान शंकर का कथन है:—
सत्संगत्वे निःसंगत्वम् निःसंगत्वे निर्मोहत्वम् ।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वम् निश्चलतत्त्वे जीवनमुक्तिः ॥
“सत्संग से वैराग्य की प्राप्ति होती है, वैराग्य के द्वारा मनुष्य अनासक्ति की प्राप्ति करता है, अनासक्ति से मन एकाग्रता प्राप्त करता है, और मन के एकाग्र हो जाने पर मनुष्य जीवन मुक्त हो जाता है।”
संसारी मनुष्यों के दुष्ट संस्कारों को शुद्ध करने के लिए ज्येष्ठ मात्र की सुसंगति पर्याप्त है।
संसारी मनुष्यों के मनों पर संत महात्माओं के आकर्षक तेजस्ज का आध्यात्मिक वातावरण का तथा उनकी शक्तिशाली विचारधाराओं का बड़ा भारी प्रभाव पड़ता है। संसारी मनुष्यों को साधु महात्माओं का संसर्ग वास्तव में भगवान की कृपा से ही प्राप्त होता है। कामी मनुष्यों के हृदय महात्माओं की संगति से शीघ्र ही पवित्र हो जाते हैं। सत्संग मन को समुन्नत करता है। जिस प्रकार एक ही काठी (दियासलाई) रुई के बड़े बड़े गठरों को तुरत
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महाचय साधना
जलाकर भस्म कर डालती है, ठीक उसी प्रकार सत्संग भी मनुष्यों के अज्ञान, कामुक संस्कार तथा दुष्कर्मों को जलाकर उुरत भस्म कर देता है। यही कारण है कि भगवान् शंकर तथा अन्य महात्माओं ने अपने ग्रन्थों में सत्संग की इस प्रकार बड़ी भारी महिमा वर्णन की है।
यदि आदको अपने स्थान में उचित सत्संग नहीं प्राप्त हो सके तो आप ऋषिकेश, बनारस, नासिक, प्रयाग, हृदिहार आदि तीर्थ स्थानों की यात्रा कीजिए। सद्भ्रमं कर अभ्ययन भी एक प्रकार का सत्संग है। विवेक, वैराग्य तथा मुमुक्षत्व प्राप्त करने के लिए सत्संग एकमात्र शक्तिशाली महीषधि है।
कामुकता को किस प्रकार हटाया जाय ? सृति के द्वारा वामना और मंस्कारों के तह से मन में संकल्प की उत्पत्ति होता है। संकल्प से आसक्ति होती है। संकल्प के साथ ही भासुकता और प्रवृत्ति उत्पन्न होते हैं। भासुकता और प्रवृत्ति पास पास रहते हैं। तत्पश्चात कामेच्छा उत्पन्न होती है, जिसके द्वारा मन और शरीर में उत्तेजना उत्पन्न हो जाती है। कामदेव के पास मोहन, स्तंभन, उन्मादन, शोषण और तपन रूपी पुष्प-शाखों से अलंकृत एक सुंदर धनुष रहता है। पहिले पहिले मोहन का ही नाश कीजिये। तपन का आक्रमण नहीं होगा। जिस प्रकार घट के भीतर भरा हुआ पानी छन या चूकर बाहर सतह पर निकल आता है, ठीक उसी प्रकार उत्तेजक संताप भी सूक्ष्म मनसे छनकर स्थूल शरीर में प्रवेश करता है। यदि आप पूर्ण सावधान हैं तो आप आरंभ ही में उठने वाले संकल्प का नाश कर सकते हैं ताकि निकटवर्ती आपत्ति का खटका ही न रहे। यदि आप संकल्प रूपी चोर को प्रथम द्वार में प्रवेश होने