ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
भों नहीं हो सकती चाहे आप नादाम, पौष्टिक औषधियाँ, दूध, घी, मक्खन आदि पदार्थों का कितना भी सेवन क्यों न करें। जिन मनुष्यों ने वीर्य का रक्षण किया है उनके लिए दैविक आनन्द का राज्य-दरबार खुला है; जीवन में वे सब प्रकार की उच्चतर सिद्धियों को प्राप्त कर सकते हैं।
धन्य हैं वे योगीराज जो ऊर्ध्वरेता बन कर अपने स्वरूप में स्थित हैं। हम लोगों को चाहिए कि हम भी सभी शम, दम, विवेक, विचार, वैराग्य, प्राणायाम, जप, ध्यान के द्वारा पूर्ण ब्रह्मचर्य का अभ्यास कर जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करें। मन और इन्द्रियों का नियन्त्रण करने के लिए, अन्तरात्मा हमें आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करे। भगवान् शंकर और शान्देव की भांति हम भी ऊर्ध्वरेता योगी बनें। हम सब के प्रति उनका शुभ आशीर्वाद हो।
दृष्टिकोण परिवर्तन कीजिए
वैज्ञानिक के लिए मनुष्य एलेक्ट्रॉस का एक समूह है। स्मृति कण्ठाद के मतानुवाद वैशेषिक तत्व ज्ञानी के लिए वह त्रगु परमाणु आदि का एक पिंड है। शेर के लिए वह भोजन की वस्तु है। कामी के लिए भोग का पदार्थ है। ईषांजु इत्कियो के लिए वह एक शत्रु है। विवेकी या वैरागी के लिए वह मास, हड्डी की बनी हुई तथा मल मूत्रादि से भरी हुई एक पुतली है। पूर्ण ज्ञानी के लिए वह सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा है। “सर्वं खलिन्दं ब्रह्म” सब ब्रह्म है। जिस प्रकार रज्जु में सर्प का मिथ्या ज्ञान होता है ठीक उसी प्रकार नाम और रूप केवल मानसिक कल्पना है।
मनोभाव का परिवर्तन कीजिए। आपको इसी लोक में स्वर्ग का आनन्द प्राप्त होगा। आप ब्रह्मचर्य में पूर्णतया स्थित होने में समर्थ होंगे। सच्चा ब्रह्मचारी बनने के लिए