ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्संग का माहात्म्य
१०१
यह एक अनुपम युक्ति है। सब स्त्रियों में आत्मा का दर्शन कीजिए। सब नाम और रूपों का परित्याग कीजिए और केवल अस्ति, भाति, प्रिय अर्थात् सत् चित् आनन्द रूपी भीतरी तथ्य को ग्रहण कीजिए। सभी नाम और रूप सत्य हैं। ये परछाईं, मृग तृष्णा, तथा आकाश में नील की भांति मिथ्या हैं।
सत्संग का माहात्म्य
सत्संग (योगी, संन्यासी और महात्माओं का संग) का माहात्म्य अकथनीय है। इसके महत्व का वर्णन भागवत, रामायण तथा अन्य ग्रन्थों में अनेक प्रकार से किया गया है। भगवान शंकर का कथन है:—
सत्संगत्वे निःसंगत्वम् निःसंगत्वे निर्मोहत्वम् ।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वम् निश्चलतत्त्वे जीवनमुक्तिः ॥
“सत्संग से वैराग्य की प्राप्ति होती है, वैराग्य के द्वारा मनुष्य अनासक्ति की प्राप्ति करता है, अनासक्ति से मन एकाग्रता प्राप्त करता है, और मन के एकाग्र हो जाने पर मनुष्य जीवन मुक्त हो जाता है।”
संसारी मनुष्यों के दुष्ट संस्कारों को शुद्ध करने के लिए ज्येष्ठ मात्र की सुसंगति पर्याप्त है।
संसारी मनुष्यों के मनों पर संत महात्माओं के आकर्षक तेजस्ज का आध्यात्मिक वातावरण का तथा उनकी शक्तिशाली विचारधाराओं का बड़ा भारी प्रभाव पड़ता है। संसारी मनुष्यों को साधु महात्माओं का संसर्ग वास्तव में भगवान की कृपा से ही प्राप्त होता है। कामी मनुष्यों के हृदय महात्माओं की संगति से शीघ्र ही पवित्र हो जाते हैं। सत्संग मन को समुन्नत करता है। जिस प्रकार एक ही काठी (दियासलाई) रुई के बड़े बड़े गठरों को तुरत