ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
पृष्ठ 114, कुल 237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयोगियों और भक्तों का संयुक्त विधान
६६
आदि प्रन्यों का नित्य नियमित रूप से अध्ययन; सात्विक भोजन, कीर्तन, प्रार्थना, ध्यान, विचार तथा अन्य उपयोगी कार्यों में सदा मन को लगाये रखना, कुसंगति का त्याग, नाटक, सिनेमा देखना—ये सभी कार्य ब्रह्मचर्य की प्राप्ति में परम सहायक है।
स्थूल शरीर पर आसन और मुद्राओं का प्रभाव अत्यधिक पड़ सकता है। यह स्थूल विधि है। प्राणायाम का प्रभाव प्राणमय कोष पर पड़ेगा। यह सूक्ष्म विधि है। व्रत, प्रत्याहार, दम, मौन, नियमित आहार आदि से इन्द्रियां शुद्ध होंगी। जप, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग, विचार आदि से मन की शुद्धि होगी। यह मानसिक विधान है। स्थूल, प्राणिक तथा मानसिक विधानों का उचित सम्मिश्रण परमावश्यक है।
आहार पर पूरा पूरा ध्यान रखिए। मिताहारी बलिष्ठ। सात्विक भोजन (दूध, फल, गेहूँ आदि) कीजिए। तीखे पदार्थ—लहसुन, प्याज, मांस, मछली, शराब आदि काम को उत्तेजित करने वाले हैं, अतः इनका मवथा त्याग कीजिए। समय समय पर व्रत करने से कामोत्पत्ति कम होगी, आवेश शांत होगा, इन्द्रियां वश में होंगी तथा ब्रह्मचर्य में सहायता मिलेगी। सभी त्रियों के प्रति भात-भाव रखिए।
ठंडा हिप-नाथ (केवल कमर डुबा कर जल में स्नान) कीजिए। प्रातः चार बजे उठिए। स्त्री का विचार न कीजिए। स्त्री की ओर न देखिए। कामुक विचारों को शुद्ध सात्विक विचारों में परिवर्तन कीजिए। मन को सदा संलग्न रखिए। अपने संकल्प को शुद्ध और दृढ़ बनाइए। जब दीर्घ एक बार नष्ट हो गया तो पुनः उसकी पूर्ति कभी