भारतकोश
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ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

योगियों और भक्तों का संयुक्त विधान

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आदि प्रन्यों का नित्य नियमित रूप से अध्ययन; सात्विक भोजन, कीर्तन, प्रार्थना, ध्यान, विचार तथा अन्य उपयोगी कार्यों में सदा मन को लगाये रखना, कुसंगति का त्याग, नाटक, सिनेमा देखना—ये सभी कार्य ब्रह्मचर्य की प्राप्ति में परम सहायक है।

स्थूल शरीर पर आसन और मुद्राओं का प्रभाव अत्यधिक पड़ सकता है। यह स्थूल विधि है। प्राणायाम का प्रभाव प्राणमय कोष पर पड़ेगा। यह सूक्ष्म विधि है। व्रत, प्रत्याहार, दम, मौन, नियमित आहार आदि से इन्द्रियां शुद्ध होंगी। जप, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग, विचार आदि से मन की शुद्धि होगी। यह मानसिक विधान है। स्थूल, प्राणिक तथा मानसिक विधानों का उचित सम्मिश्रण परमावश्यक है।

आहार पर पूरा पूरा ध्यान रखिए। मिताहारी बलिष्ठ। सात्विक भोजन (दूध, फल, गेहूँ आदि) कीजिए। तीखे पदार्थ—लहसुन, प्याज, मांस, मछली, शराब आदि काम को उत्तेजित करने वाले हैं, अतः इनका मवथा त्याग कीजिए। समय समय पर व्रत करने से कामोत्पत्ति कम होगी, आवेश शांत होगा, इन्द्रियां वश में होंगी तथा ब्रह्मचर्य में सहायता मिलेगी। सभी त्रियों के प्रति भात-भाव रखिए।

ठंडा हिप-नाथ (केवल कमर डुबा कर जल में स्नान) कीजिए। प्रातः चार बजे उठिए। स्त्री का विचार न कीजिए। स्त्री की ओर न देखिए। कामुक विचारों को शुद्ध सात्विक विचारों में परिवर्तन कीजिए। मन को सदा संलग्न रखिए। अपने संकल्प को शुद्ध और दृढ़ बनाइए। जब दीर्घ एक बार नष्ट हो गया तो पुनः उसकी पूर्ति कभी

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ब्रह्मचर्य साधना

भों नहीं हो सकती चाहे आप नादाम, पौष्टिक औषधियाँ, दूध, घी, मक्खन आदि पदार्थों का कितना भी सेवन क्यों न करें। जिन मनुष्यों ने वीर्य का रक्षण किया है उनके लिए दैविक आनन्द का राज्य-दरबार खुला है; जीवन में वे सब प्रकार की उच्चतर सिद्धियों को प्राप्त कर सकते हैं।

धन्य हैं वे योगीराज जो ऊर्ध्वरेता बन कर अपने स्वरूप में स्थित हैं। हम लोगों को चाहिए कि हम भी सभी शम, दम, विवेक, विचार, वैराग्य, प्राणायाम, जप, ध्यान के द्वारा पूर्ण ब्रह्मचर्य का अभ्यास कर जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करें। मन और इन्द्रियों का नियन्त्रण करने के लिए, अन्तरात्मा हमें आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करे। भगवान् शंकर और शान्देव की भांति हम भी ऊर्ध्वरेता योगी बनें। हम सब के प्रति उनका शुभ आशीर्वाद हो।

दृष्टिकोण परिवर्तन कीजिए

वैज्ञानिक के लिए मनुष्य एलेक्ट्रॉस का एक समूह है। स्मृति कण्ठाद के मतानुवाद वैशेषिक तत्व ज्ञानी के लिए वह त्रगु परमाणु आदि का एक पिंड है। शेर के लिए वह भोजन की वस्तु है। कामी के लिए भोग का पदार्थ है। ईषांजु इत्कियो के लिए वह एक शत्रु है। विवेकी या वैरागी के लिए वह मास, हड्डी की बनी हुई तथा मल मूत्रादि से भरी हुई एक पुतली है। पूर्ण ज्ञानी के लिए वह सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा है। “सर्वं खलिन्दं ब्रह्म” सब ब्रह्म है। जिस प्रकार रज्जु में सर्प का मिथ्या ज्ञान होता है ठीक उसी प्रकार नाम और रूप केवल मानसिक कल्पना है।

मनोभाव का परिवर्तन कीजिए। आपको इसी लोक में स्वर्ग का आनन्द प्राप्त होगा। आप ब्रह्मचर्य में पूर्णतया स्थित होने में समर्थ होंगे। सच्चा ब्रह्मचारी बनने के लिए

सत्संग का माहात्म्य

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यह एक अनुपम युक्ति है। सब स्त्रियों में आत्मा का दर्शन कीजिए। सब नाम और रूपों का परित्याग कीजिए और केवल अस्ति, भाति, प्रिय अर्थात् सत् चित् आनन्द रूपी भीतरी तथ्य को ग्रहण कीजिए। सभी नाम और रूप सत्य हैं। ये परछाईं, मृग तृष्णा, तथा आकाश में नील की भांति मिथ्या हैं।

सत्संग का माहात्म्य

सत्संग (योगी, संन्यासी और महात्माओं का संग) का माहात्म्य अकथनीय है। इसके महत्व का वर्णन भागवत, रामायण तथा अन्य ग्रन्थों में अनेक प्रकार से किया गया है। भगवान शंकर का कथन है:—

सत्संगत्वे निःसंगत्वम् निःसंगत्वे निर्मोहत्वम् ।

निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वम् निश्चलतत्त्वे जीवनमुक्तिः ॥

“सत्संग से वैराग्य की प्राप्ति होती है, वैराग्य के द्वारा मनुष्य अनासक्ति की प्राप्ति करता है, अनासक्ति से मन एकाग्रता प्राप्त करता है, और मन के एकाग्र हो जाने पर मनुष्य जीवन मुक्त हो जाता है।”

संसारी मनुष्यों के दुष्ट संस्कारों को शुद्ध करने के लिए ज्येष्ठ मात्र की सुसंगति पर्याप्त है।

संसारी मनुष्यों के मनों पर संत महात्माओं के आकर्षक तेजस्ज का आध्यात्मिक वातावरण का तथा उनकी शक्तिशाली विचारधाराओं का बड़ा भारी प्रभाव पड़ता है। संसारी मनुष्यों को साधु महात्माओं का संसर्ग वास्तव में भगवान की कृपा से ही प्राप्त होता है। कामी मनुष्यों के हृदय महात्माओं की संगति से शीघ्र ही पवित्र हो जाते हैं। सत्संग मन को समुन्नत करता है। जिस प्रकार एक ही काठी (दियासलाई) रुई के बड़े बड़े गठरों को तुरत

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महाचय साधना

जलाकर भस्म कर डालती है, ठीक उसी प्रकार सत्संग भी मनुष्यों के अज्ञान, कामुक संस्कार तथा दुष्कर्मों को जलाकर उुरत भस्म कर देता है। यही कारण है कि भगवान् शंकर तथा अन्य महात्माओं ने अपने ग्रन्थों में सत्संग की इस प्रकार बड़ी भारी महिमा वर्णन की है।

यदि आदको अपने स्थान में उचित सत्संग नहीं प्राप्त हो सके तो आप ऋषिकेश, बनारस, नासिक, प्रयाग, हृदिहार आदि तीर्थ स्थानों की यात्रा कीजिए। सद्भ्रमं कर अभ्ययन भी एक प्रकार का सत्संग है। विवेक, वैराग्य तथा मुमुक्षत्व प्राप्त करने के लिए सत्संग एकमात्र शक्तिशाली महीषधि है।

कामुकता को किस प्रकार हटाया जाय ? सृति के द्वारा वामना और मंस्कारों के तह से मन में संकल्प की उत्पत्ति होता है। संकल्प से आसक्ति होती है। संकल्प के साथ ही भासुकता और प्रवृत्ति उत्पन्न होते हैं। भासुकता और प्रवृत्ति पास पास रहते हैं। तत्पश्चात कामेच्छा उत्पन्न होती है, जिसके द्वारा मन और शरीर में उत्तेजना उत्पन्न हो जाती है। कामदेव के पास मोहन, स्तंभन, उन्मादन, शोषण और तपन रूपी पुष्प-शाखों से अलंकृत एक सुंदर धनुष रहता है। पहिले पहिले मोहन का ही नाश कीजिये। तपन का आक्रमण नहीं होगा। जिस प्रकार घट के भीतर भरा हुआ पानी छन या चूकर बाहर सतह पर निकल आता है, ठीक उसी प्रकार उत्तेजक संताप भी सूक्ष्म मनसे छनकर स्थूल शरीर में प्रवेश करता है। यदि आप पूर्ण सावधान हैं तो आप आरंभ ही में उठने वाले संकल्प का नाश कर सकते हैं ताकि निकटवर्ती आपत्ति का खटका ही न रहे। यदि आप संकल्प रूपी चोर को प्रथम द्वार में प्रवेश होने

विशेष उपदेश

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से न रोक सकें तो फिर दूसरे द्वार पर पूरे सावधान रहिये जब कि कामुक उत्तेजना प्रकट होने लगे। आप अबलें कामुक उत्तेजना को सहज ही में रोक सकते हैं ताकि वह जननेन्द्रिय तक पहुँच ही न सके। हठ यौगिक क्रियायें तथा प्राणायाम द्वारा वीर्य शक्ति को मस्तिष्क की ओर ले जाकर ओज शक्ति में परिणत कीजिये। मन को हटाइये। ऊँ अथवा किसी भी अन्य मंत्र का एकाग्र चित्त से उच्चारण कीजिये। प्रार्थना कीजिये। ध्यान कीजिये। यदि इस पर भी आप अपने मन पर नियंत्रण करने में असमर्थ हों तो फिर सत् संग की शरण लीजिये, अकेले न रहिये जब प्रबल कामुक उत्तेजना एकाएक प्रकट होकर जननेन्द्रिय तक पहुँच जाती है तो आप सब कुछ भूलकर मदाम्ब हो जाते हैं। आप काम के शिकार बन जाते हैं। पश्चात् आप पश्चाताप करने लगते हैं।

विशेष उपदेश

कामेच्छा और तत्संबंधी संस्कारों का संपूर्णतया नाश व आत्म-साक्षात्कार होने पर ही हो सकता है। यौगिक साधनों तथा ध्यानादि के द्वारा कामेच्छा का बहुत अधिक सीमा तक हास किया जा सकता है। गीता अध्याय २ श्लोक ४६ में देखिए “यद्यपि इन्द्रियों के द्वारा विषयों को न ग्रहण करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु राग नहीं निवृत्त होता, परन्तु इस पुरुष (स्थिर बुद्धि) का तो राग भी परमात्मा को साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाता है।”

एक कामी अविवाहित पुरुष के सदा ऐसे विचार हुश्रा करते हैं “मैं कब एक युवती पत्नी के साथ जीवन यापन करने में समर्थ हो सकूँगा?” एक उदासीन ग्रहस्थी जिस

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ब्रह्मचर्य साधना

में कुछ विवेक उत्पन्न हुआ है, वह नित्य सोचता रहता है “मैं कब अपनी स्त्री के पंजों से मुक्त होकर भगवत् चिंतन के लिये बनगामी होऊंगा ?” इस मत भेद पर अब आप स्वयं विचार कर सकते हैं।

सदाचार ब्रह्मचर्य का ही तत्सम्बन्धी शब्द है। वह मनुष्य जो एक वर्ष तक ब्रह्मचर्य वृत्ति रखता है परन्तु जो दो या तीन वर्षों में कभी कभी स्त्री प्रसंग करता है, उस मनुष्य से अधिक सदाचारी समझा जाता है जो नित्य अपनी विवाहिता स्त्री के साथ प्रसंग करता है। वह मनुष्य जो नित्य कामुक विचारों में ही निमग्न रहता है सब से अधिक दुराचारी है। परन्तु अज्ञानी मूर्ख सांसारिक लोग सदाचार के सिद्धांत को अपने ही दृष्टिकोण से समझते हैं तथा केवल बाहरी स्थितियों की ओर ही ध्यान देते हैं न कि आंतरिक मानसिक स्थिति की ओर।

यदि आप कामुक विचारों पर अधिकार नहीं जमा सकते तो कम से कम स्थूल शरीर पर तो अधिकार रखिये। भरसक साधना कीजिये। एक दिन वह भी आ जायगा जब कि आप कामुक विचारों से सर्वथा मुक्त हो जायेंगे। यह आपके लिए एक कड़ा युद्ध है। परन्तु ऐ मेरे प्यारे मित्रों! आपको यह करना ही पड़ेगा, यदि आप नित्य शांति और अमर जीवन प्राप्त करना चाहते हैं।

कामुक विचार को दबा देने से विशेष काम नहीं चलेगा। उचित अवसर प्राप्त होने पर जब आप की इच्छा शक्ति कमजोर हो जायगी, जब वैराग्य क्षीण हो जायगा, जब ध्यान मा यौगिक साधना में शिथिलता आजायगी, जब किसी रोगाक्रमण से आप दुर्बल हो जायेंगे, तो वह स्त्री पूर्व कामवासना द्विगुणी शक्ति के साथ पुनः प्रकट

विशेष उपदेश

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हो जायगी। जप, प्रार्थना, ध्यान, धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन, प्राणायाम, आसन आदि के अभ्यास द्वारा काम-शक्ति को ओज-शक्ति में परिणत करनी चाहिए। आपको भक्ति तथा मुमुक्षुत्व की वृद्धि करनी चाहिए। आप शुद्ध, अमर, अलिंग, अनंग, अनिच्छित् आत्मा का निरन्तर ध्यान कीजिए। केवल तब ही आप की काम वासना समूल नष्ट हो सकती है।

जो लोग ब्रह्मचर्य का अभ्यास करते हैं, उनकी ओर से यह आम शिकायत है कि उन्हें इन्द्रिय दमन के कारण मानसिक बाधा होती है। यह केवल मन का कपट (छल) है। कभी कभी आप का मिथ्या भूल लगती है और उस हिप्ति में जब आप भोजन करने के लिए बैठते हैं तो आपको वास्तविक उत्तम भूल नहीं होती और आप खाना नहीं खाते। ठीक उसी प्रकार की यह आपकी मानसिक बाधा भी है। यदि आप ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे तो आपको अपार मानसिक बल की प्राप्ति होगी। आप हर समय उसका अनुभव नहीं कर सकेंगे। जिस प्रकार एक पहलवान अखाड़े में अपने शारीरिक बल को प्रकट करता है (यद्यपि साधारण समय में वह एक साधारण मनुष्य प्रतीत होता है) ठीक उसी प्रकार आप भी अपने उस मानसिक बल को अवसर उपस्थित होने पर प्रकट करेंगे।

योगिक क्रियायें सीखने में आपका उद्देश्य शुद्ध होना चाहिए। योगिक क्रियायें और ब्रह्मचर्य के द्वारा केवल आत्म साक्षात्कार करने का ही आपका एक मात्र विचार होना चाहिए। लिंग-शक्ति का रूपांतरण प्राप्त कीजिए। इसके द्वारा जो आपको शक्ति प्राप्त हो उसका दुःखयोग न कीजिए। अपने उद्देश्य का पूर्णतया विश्लेषण कीजिये।

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ब्रह्मचर्य साधना

योग मार्ग में अनेकानेक प्रलोभन और वाधाएँ हैं।

यह स्थांतरण (पूर्ण ब्रह्मचर्य या पवित्रता) आप प्राप्त कर सकते हैं : यदि आप उसे प्राप्त करना चाहें। मार्ग अत्यन्त सरल, सीधा, और सुगम है, यदि आप उसको सकफ़ी और यदि आप में धैर्य, लगन, संकल्प और दृढ़ हल्का हो, और यदि आप इन्द्रिय दमन, सदान्दार, दृढ़ विचार, सत् कार्य, निदिध्यासन, तत्परता, आत्म संकेत और आत्म विचार (मैं कौन हूँ ?) आदि बातों का अभ्यास करें। आत्मा विकार रहित है। इसका अनुभव कीजिए। क्या नित्य शुद्ध आत्मा में कहीं काम वासना या अपवित्रता का लेश-मात्र भी पाया जा सकता है ?

आप सबों के भीतर एक गुप्त श्रेयस्पीयर या कालीदास, एक गुप्त वर्डसवर्थ या बाल्मीकि, सेन्ट जेवियर, ब्रह्मचारी भीष्म पितामह, हनुमान या लक्ष्मण, विश्वामित्र या वशिष्ठ, डाक्टर जे० सी० बोस या रमण महर्षि, योगी शान्देव या गोरखनाथ, वेदान्ती शंकर या रामानुज, भक्त तुलसीदास, रामदास या एकनाथ आदि मिल सकते हैं। एतदर्थ ब्रह्मचर्य के द्वारा अपनी प्रसुप्त गुप्त शक्तियों को जाग्रत कीजिए और जन्म, मरण और चिंताओं से सने हुए इस सांसारिक जीवन के दुःखों को पार कर शीघ्र आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कीजिए।

धन्य है वह ब्रह्मचारी जिसने आजन्म ब्रह्मचर्य प्रतधारण करने का संकल्प किया है। धन्य है, धन्य है वह ब्रह्मचारी जो कामवासना को दग्ध करने तथा पूर्ण पवित्रता प्राप्त करने के लिए वास्तविक प्रयत्न कर रहा है। धन्य है, धन्य है यह ब्रह्मचारी जिसने कामवासना को संपूर्णतया नष्ट कर आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर लिया है। ऐसे प्रशंस-

ब्रह्मचारियों के लिये नियम

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नीय ब्रह्मचारियों की जै हो ! वास्तव में वे इस संसार में देवता ही हैं । आप सबों के प्रति उनका आशीर्वाद हो ।

ब्रह्मचारियों के लिए नियम

विवाह न कीजिए, न कीजिए, न कीजिए । विवाह सब से बड़ा वन्धन है । विवाह निरन्तर चिंता और दुःख का स्रोत है । बुद्ध, स्वामी पत्तिनव, भर्तृहरि और गोपीचंद ने क्या किया ? क्या विवाह के बिना वे सुख और शांति में न रहे ?

रुखे (मोटे या भद्दे) बिस्तर पर सोहए । रुखे (आसन) चटाहयां काम में लाहए । बाईं करवट पर सोहये । रात भर सूर्य नाड़ी (पिंगला को) चलने दीजिए । अलग अलग सोहए ।

अपने स्वभाव को शीघ्र परिवर्तन कर दीजिए । इस से आप स्वस्थ, धनवान और बुद्धिमान बनेंगे ।

अपने जननेन्द्रिय की और न देखिए । उसे न छूहये । जब वह उत्तेजित हो तो मूल और उद्विग्न बंध कीजिए । भाव सहित ॐ का बार बार उच्चारण कीजिए । पवित्रता का चिंतन कीजिये । बीस प्राणायाम कीजिये । अपवित्रता रूपी बादल शीघ्र छिन्न-भिन्न हो जायगा ।

ब्रह्मचारी को किसी भी स्त्री की ओर काम भरी दृष्टि से नहीं देखना चाहिये । उसको कुसित भावना के साथ स्त्री के पास जाने तथा उसे छूने की इच्छा नहीं करनी चाहिए । उसके लिए स्त्री के साथ खेलना, हँसी मजाक करना तथा बातचीत करना उचित नहीं है । उसको स्त्री के गुणों की प्रशंसा नहीं करनी चाहिए । न तो अपने मन में और न अपने मित्रों के प्रति ही । वह स्त्री से एकान्त में भाषण भी न करें, न स्त्री का कभी चिंतन ही करें । उसको स्त्री से

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ब्रह्मचर्य साधना

मुख्य भोग की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। ब्रह्मचारी को चाहिए कि वह स्त्री-प्रसंग कदापि न करे। यदि वह उप-युक्त नियमों का भंग करता है तो वह ब्रह्मचर्य व्रत का खंडन करता है। जब आप रास्ते में चल रहे हैं तो बंदर की भांति दृष्टि उधर न देखिए। नीचे जमीन की ओर देखते हुए गंभीरता पूर्वक चलिए। नाक की सीध में भी देख सकते हैं। इससे ब्रह्मचर्य के पालन में बहुत सहायता मिलती है।

स्त्री की ओर देखने से आपके मन में उससे बातचीत करने की इच्छा उत्पन्न होगी। बातचीत करने से उसको स्पर्श करने की इच्छा होगी। अन्ततः आपका मन कुसित होकर आप काम के शिकार बन ही जायेंगे। इस लिए स्त्री की ओर काम दृष्टि से कभी भी न देखिए, न उससे एकांत में बातचीत कीजिए और न कभी उसके साथ मित्रता की।

साधकों को चाहिए कि वे लिंग (स्त्री-पुरुष) संबंधों वालीलाप में भाग न लें और न कभी स्त्रियों का चिंतन ही करे। स्त्री का विचार मन में उत्पन्न होते ही अपने इस देवता की मूर्ति का ध्यान कीजिए, अपने इस मन्त्र का बार बार जोर जोर से उच्चारण कीजिए। पशु पक्षियों को प्रसंग करते देख कर या किसी के नंगे शरीर को देखकर यदि आपके मन में काम की भावना उत्पन्न हो जाती तो इससे यही अनुमान किया जाता है कि आपके मन में अभी तक कामवासना गुप्त रूप से भरी हुई है। कुछ व्यक्ति ऐसे अनुरागी और आसक्त होते हैं कि स्त्री के स्पर्श, दृष्टि व स्पर्श मात्र से ही उनका वीर्य पात हो जाता है। ब्रह्मा ! कौसी शोचनीय दशा है उनको यह !

कोई भी साधु किसी स्त्री से हाथ मिलाते हुए या

ब्रह्मचारियों के लिये नियम

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उसके शरीर के किसी भाग को स्पर्श करते हुए यदि वह कुत्सित विचारों के साथ नमन करता है तो वह अपने भेष व आश्रम का भान भंग करता है ब्रह्मचर्य व्रत जो एक बार धारण कर लिया है वह जीवन पर्यन्त सब प्रकार के स्त्री-प्रसंग से दूर रहने के लिये है। जैन धर्म में इस नियम पर बड़ा जोर दिया गया है, तदनुसार स्त्रियों के स्त्रियों को देखना, उनका चिन्तन करना तथा स्त्री संबंधी कोई भी बातचीत करना एकदम मना है। इसीलिए तो सब दुर्गुणों में काम को नीचतम (सब से बुरा) बताया गया है।

जो नियम पुरुषों के लिए स्त्रियों के प्रति हैं वे ही नियम स्त्रियों के लिए पुरुषों के प्रति हैं। इन उपदेशों का तात्पर्य यह नहीं कि या तो पुरुष हेय समझे जायें अथवा स्त्री को हेय माना जाय। तात्पर्य तो कामवृत्ति के उन्मूलन से है। काम से घृणा कीजिए। परंतु किसी भी व्यक्ति से नहीं दिव्य-भाव बनाए रखिए।

ब्रह्मचारियों को पान, तम्बाखु, चाय, कॉफी आदि मादक वस्तुओं का सर्वथा त्याग करना चाहिए। तम्बाखु एक प्रकार का विष उत्पन्न करता है जिसके कारण शरीर में अनेक प्रकार के रोग दिल व आंखों के रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

इसके अतिरिक्त कुछ अन्य नियम भी हैं जो ब्रह्मचारियों को पालन करने आवश्यक हैं।

भिक्षु के लिए उस स्थान में सोना मना है जिस स्थान में कोई स्त्री हो। भिक्षु किसी भी स्त्री को पांच या छः शब्द से अधिक शब्दों में उपदेश भी न दे, यदि वहां कोई सयाना पुरुष विद्यमान न हो। वह (भिक्षु) न तो किसी

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ब्रह्मचर्य साधना

बहिन को शिक्षा ही दे और न किसी स्त्री के साथ कहीं यात्रा ही करे । जब वह भिक्षा लेने के लिये जाय तो अपने बसंतों को उचित रीति से ढाके रखले तथा चलते समय नजर सामने नीचे की ओर रखले, इधर उधर न देखे । उसे चाहिए कि वह जहां तक हो किसी भी स्त्री या बहिन से दिये हुआ वस्त्र अंगीकार न करे । कुल्लित विचार या कुवासना के साथ स्त्री के साथ बातचीत करना व उसका स्पर्श करना तो दूर रहा, वह (भिक्षु) स्त्री के साथ एकांत स्थान में बैठे ही नहीं ।

“पवित्र कुमारी समाज” की स्थापना महात्मा दूसरा द्वारा की गई थी । इसमें बालिकायें ३० वर्षों तक अविवाहित रहती थीं । ब्रह्मचर्य व्रत भंग के लिए सजीव (जिंदा) दफना देना ही उसका प्रायश्चित्त था । ये कुमारियां अपनी असाधारण शक्ति व आत्म प्रतिष्ठा के लिए प्रसिद्ध थीं । साधारणतः राज (शाही) घराने के आदर के समान उनका आदर था । जब वे रास्ते में चलती थीं तो एक पहरेदार उनके आगे आगे चलता था तथा बड़े आँफिसरों को उन्हें रास्ता देना पड़ता था । कभी कभी गाड़ी में बैठकर चलने का भी उनको विशेष (असाधारण) अधिकार था । सार्वजनिक खेल तमाशों में भी उनके बैठने के लिए उच्च प्रतिष्ठित स्थान नियत किया जाता था । साधारण नित्यमें से परे होने के कारण, मरने के पश्चात् राजपरिजनों की नाहं वे शहर ही में दफनाई जाती थीं । दयालुता का शाही अधिकार भी उनको यहाँ तक था कि यदि कोई फांसी की सजा प्राप्त अपराधी उनको रास्ते में मिल जाता तो उसकी माफ़ हो जाती थी । और वह मुक्त कर दिया जाता था । बौद्धों के भिक्षु समाज के मोक्ष संबंधी (पतिमोक्ष)

ब्रह्मचारियों के लिये नियम

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२२७ नियम थे ! इनमें से पहिले चार विशेष आवश्यक थे। यदि इनमें से किसी एक नियम का भी भंग हुआ, कि भिन्नक समाज से पृथक् (अलग) कर दिया जाता था। इसीलिये वे पराजित कहे जाते थे। जिन्होंने नियम खंडन किया वे पराजय प्राप्त करते थे।

पहिला नियम इस प्रकार है “कोई भी भिन्न (जिसने) एक बार आत्म-संशोधन तथा जीवन की नियम पद्धति को अपना लिया है और तत्पश्चात् अपने आपको उस से असंबंधित कर देने की घोषणा न की हो, यदि वह किसी भी प्राणी (इसमें पशु भी सम्मिलित हैं) के लैंगिक भोग विषयों का उपभोग करता हुआ प्रतीत होगा तो वह न्युत व पराजित समझा जायगा और समाज से उसका संबंध तोड़ दिया जायगा।” यदि कोई भिन्न किसी समय अपने आपको समाज से अलग कर, वस्त्र बदल कर पुनः संसारी बनने की इच्छा करता हो तो वह ऐसा करने के लिये भी स्वतन्त्र था।

दार्जिलिंग में जहां तिबत वालों की विशाल नई शस्ती है, उसमें सैकड़ों मजदूर-पेशा के व्यक्ति ऐसे थे जो ब्रह्मचर्य व्रत भंग करने तथा उस से मिलने वाले कड़े दंड से बचने के लिए अकेले या अपने यारों के साथ तिब्बत से भाग चले आये थे। ये सब भागकर आये हुये व्यक्ति बौद्ध भिन्न्यों से पृथक् समझे जाते थे। यदि कोई अपराधी पकड़ा गया तो उसको भारी अर्थ-दंड तथा आम जनता के समक्ष शारीरिक दंड दिया जाता है और वह कलंकित कर समाज से पृथक् कर दिया जाता है।

आपको सदा वह भाव रखना चाहिये कि सभी स्त्रियां उस आदि शक्ति जगद् जननी के ही न्यून रूप हैं। जैसे

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ब्रह्मचर्य साधना

कि “दुर्गा सप्तशती” में आता है “विद्या समस्तास्तव देविमेदा, स्त्रियाः समस्ता सकला जगत्सु” आपको उनकी उपासना करनी चाहिये। यह अभ्यास नये साधक के लिए आत्मभाव (प्रत्येक वस्तु आत्मा है) की प्राप्ति वे लिए है। अन्यथा वह स्त्रियों से घृणा करना आरम्भ कर देगा और उनमें दिव्य प्रेम की बुद्धि नहीं होगी। उपर्युक्त अभ्यास कामवासना को दूर करने के लिये एक मानसिक उपचार है।

उक्त भाव की प्राप्ति बहुत कठिन है। “सब स्त्रियां आपकी मातायें और बहिन हैं” यह भाव व्यवहृत करने में आप १०१ बार असफल हो सकते हैं। इसकी परवाह नहीं। आप अपने अभ्यास पर दृढ़ रहिये। अन्त में आप को सफलता अवश्य प्राप्त होगी। आपको अपने पुराने मन को नष्ट कर एक नया मन बनाना पड़ेगा। हो न हो, आपको ऐसा करना ही पड़ेगा यदि आपको अमरत्व तथा नित्यानन्द प्राप्त करना है। यदि आप अपने संकल्प में दृढ़ है और अपने विचार के पक्के हैं, तो आप को सफलता अवश्य प्राप्त होगी। अभ्यास के द्वारा भाव शनैः शनैः व्यक्त होगा। आप शीघ्र उस भाव में स्थित हो जावोगे। अब आप निःसंकोच हैं।

पारम्परिक अभ्यासावस्थाओं में आपको चाहिए कि आप सदा स्त्रियों से दूर रहें। जब आप ब्रह्मचर्य में स्थित रहते हुए पूर्णरूप से सान्चे में ढल जाय तो फिर आप कुछ समय के लिए अपने बल के परीक्षार्थ, स्त्रियों के संग विचरण कर सकते हैं। तत्पश्चात् यदि मन आपका विशुद्ध हो गया है और आप शम, दम, उपरति के अभ्यास द्वारा अपने मन से लिंग (स्त्री-पुरुष) भाव को सर्वथा नष्ट कर

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चुके हैं, तो उस स्थित में आप यह कह सकते हैं कि आपने अपनी साधना में यथोचित उन्नति प्राप्त कर ली है। अब आप निश्चंक हैं। इस पर भी आपको अपनी साधना स्थगित (बंद) नहीं करनी चाहिये, यह जानते हुये कि आप एक जितेन्द्रिय योगी हैं। यदि आप अपना साधन-अभ्यास बंद कर देंगे तो आपका भारी अघोषित होगा। यदि आप जीवनमुक्त और शक्तिशाली योगी क्यों न हो, आपको चाहिए कि आप सांसारिक लोगों के साथ विचरण करते समय अत्यन्त सावधान रहें।

एक महात्मा जो अपने शिष्यों के द्वारा एक अन्तर माना जाता था, वह योग-ब्रह्म हो गया। वह भी स्त्रियों के साथ स्वतन्त्रता पूर्वक संसर्ग करते रहने के कारण, पतित हो गया। वह काम का शिकार बन गया। यह कैसा दुःख-मय दुर्भाग्य है। साधकगण अनेकानेक बड़ी बड़ी कठिनाइयों को पार करते हुए योगस्वी निश्चयिणी पर आरूढ़ होते हैं परन्तु वे अपनी असावधानी व आध्यात्मिक अहंकार के कारण इस प्रकार से पतित होते हैं कि फिर वे जीवन पर्यन्त भी ऊपर उठने में समर्थ नहीं होते।

वे साधक जो योग मार्ग में बहुत कुछ उन्नति कर चुके हैं, उन्हें, चाहिए कि वे बहुत सावधान रहें। वे स्वतन्त्रता पूर्वक स्त्रियों के साथ संसर्ग न करें। उनको मूर्खतावश यह नहीं समझना चाहिये कि वे योग में पूर्ण प्रवीण हो गये हैं। एक प्रसिद्ध संत महात्मा का अघोषित हो गया। वह स्वतन्त्रता पूर्वक स्त्रियों के साथ संसर्ग रखता और उन्हें अपनी चेलियाँ बनाई, जो उसके पैर तक दवाने लगीं। क्योंकि उसने अपने वीर्य को सर्वथा रूपांतरित कर श्रोत्र में परिणत नहीं किया था और चूंकि उसके मन

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ब्रह्मचर्य साधना

में कामवासना सूक्ष्म रूप से छिपी हुई थी, वह काम का शिकार बन गया। उसने अपना सम्मान खो दिया। उसमें कामवासना केवल दबी हुई थी और जब उचित अवसर आया तो वह पुनः जाग्रत हो गई और अपना स्पर्श रूप धारण कर लिया। उसमें प्रलोभन का प्रतीकार करने के लिये के बल नहीं था और न उसकी इच्छा शक्ति ही प्रबल थी।

वह योगी जिसने उच्चतम निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर ली है और जिसमें संस्कारों के बीज संपूर्णतया भुन चुके हैं, वह पूर्ण ऊर्ध्वरेता योगी कहलाने का अधिकारी है यानी जितने पूर्णरूप से बीज को आज में बदल लिया है।

यह योगी जिसने, निरन्तर साधना, ध्यान, प्राशायाम, आत्मविचार, यम, नियम, शम, दम के अभास द्वारा, अपने आपको स्थित किया है, वह भी निःशंक है यद्यपि उसने ऊर्ध्वरेता की स्थिति प्राप्त नहीं की है। वह स्त्रियों द्वारा आकर्षित नहीं हो सकेगा। उसने अपने मन को कुसा (सूक्ष्म) कर डाला है। उसके मन का नाश हो चुका है। अब काम-वासना अपना मस्तक ऊपर नहीं उठा सकती। वह अब फूफकार भी नहीं सकती। वह योगी जिसने विशिष्ट ब्रह्मचर्य के द्वारा काम पर संपूर्ण विजय प्राप्त करली है, उसके लिए तो पतित होने का कुछ भी भय नहीं है। वह सर्वथा निःसंकोच है। वह अपवित्रता से सर्वथा मुक्त ही रहेगा। यह स्थिति बहुत ही ऊँची अवस्था है। इस विशिष्ट पवित्र अवस्था को केवल शंकर, दत्तात्रेय, ज्ञानदेव आदि चंद महत्माओं ने ही प्राप्ति की है।

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नवों अध्याय

हठयोग की प्रक्रियायें

(१) सिद्धासन

यह आसन ब्रह्मचर्य के अभ्यास के लिये श्रेष्ठ है। यह स्वप्नदोष को रोकने, काम पर विजय प्राप्त करने तथा ऊर्ध्ववरेता योगी बनने में सहायता प्रदान करता है। यह आसन जप, और ध्यान के लिये भी उपयोगी है।

बायें पैर की एड़ी को गुदा-स्थान पर रखिये। दूसरे पैर की एड़ी का जननेन्द्रिय के मूल भाग पर रखिये। दोनों

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ब्रह्मचर्य साधना

पैर के टखने आपस में एक दूसरे से मिल जानें चाहिये। हाथों को घुटनों पर रख दीजिये। शरीर गर्दन और मस्तक को नीचा रखिये। पहले पहल आध घंटे तक बैठने का अभ्यास कीजिये और पुनः पुनः धीरे धीरे समय बढ़ाते हुये पूरे तीन घंटे तक बैठने का अभ्यास कीजिये। तीन घंटों तक लगातार एक आसन से बैठना ही आसन-जय कहलाता है।

(२) शीर्षासन

बल भि लकुल मीधे खड़े हो

यह सब आसनों का राजा है। इस आसन से होने वाले जो लाभ हैं, वे अकथनीय और अगणित हैं। यह मस्तिष्क व स्मरण-शक्ति को बढ़ाता है, ब्रह्मचर्य की रक्षा करता है तथा वीर्य को श्रोत्र में परिणत करता है।

समतल भूमि पर चौगुनी कंबल बिछा लीजिये। दोनों हाथों की अंगुलियों को तालीबंध कर लीजिये। अब अपने मस्तक के ऊपरी भाग को दोनों हाथों की बद्ध हथेलियों में रखिये। धीरे धीरे टांगों को ऊपर उठाते हुए शिर के जाड़ये। टांगों को थामने के

सर्वांगासन

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लिये आरम्भ में किसी दीवाल या अपने मित्र की सहायता लीजिये। कुछ अभ्यास के बाद आप स्वयं संतुलन (स्थिरता) प्राप्त करने में समर्थ होंगे। जब आसन कर चुकें तो टांगों को बहुत धीरे धीरे नीचे ले आइये। आसन करते समय केवल नाक के द्वारा स्वांस लीजिये। अनियमित रूप से कुम्भक, रेचक और पूरक करने से आसन में अस्थिरता आ जायगी।

इस आसन का अभ्यास खाली पेट करना चाहिए। इस आसन के द्वारा पेट के, आंतों के, फेफड़े के, हृदय के, गुर्दा के, कानों के, आंखों के तथा मूत्र संबंधी अनेकानेक

पुराने असाध्य रोग नष्ट होते हैं।

आसन करते समय यदि आपकी टांगें हिलती हों तो कुछ समय के लिये स्वांस को रोकिये; टांगों में स्थिरता आजायगी।

(३) सर्वांगासन

यह भी एक परमावश्यक आसन है। यह भी ब्रह्मचर्य की रक्षा करने, आयु को दीर्घ बनाने, भूत व पाच न शक्ति को बढ़ाने तथा थाइ-रोइड (Thyroid) को कुशलता पूर्वक चालू रखने में सहायता प्रदान

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ब्रह्मचर्य साधना

करता है। इस आसन के अभ्यास से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है तथा चेहरे पर सुन्दरता व श्रोज झलकने लगता है।

अभ्यास कीजिये और उसका प्रभाव प्रत्यक्ष अनुभव कीजिये। शीर्षासन, सर्वांगासन, पश्चिमोत्तान आसन, और मयूरासन मुझे अत्यन्त प्रिय है। मैं अपने सभी विद्यार्थियों को इनका अभ्यास करने की शिक्षा देता हूँ।

भूमि पर कंबल बिछा लीजिये। कमर के बल सीधे चिन्ह लम्ब जाइये। धीरे धीरे टांगों को ऊपर उठाइये। धड़ और जंशाओं को भी ऊपर उठाइये। दोनों ओर से हाथों के सहारे कमर को थामे रहिये। अब सारा शरीर का भार आपके कंधों व केंदुनियों पर रहेगा। टांगों को स्थिर रखिये। टुट्टी को छाती की ओर हटता पूर्वक दबाये रखिये। केवल नासिका द्वारा धीरे धीरे स्वांस लीजिये। पांच मिनट से आरम्भ कीजिये और फिर धीरे धीरे जितना हो सके समय बढ़ाइये।

(४) मस्त्यासन